अन्वयः--जन्ममासभतिथौ आद्यगर्भसुतकन्ययो: द्यो: करग्रह: न उचित: । चेत् द्वितीयजनूषो: सुतकन्ययो: (करग्रह:) सुतप्रदः विबूधे: प्रशस्यते ॥। १४ ॥। जन्ममास, जन्मनक्षत्र, जन्मतिथि और जन्मलग्न में प्रथम उत्पन्न पुत्र वा विवाहप्रकरण १०५ कन्या का विवाह उचित नहीं है। उसके बाद उत्पन्न पुत्र वा कन्या का विवाह पुत्र का देनेवाला और पण्टडितों से प्रशंसित भी है ॥। १४ ॥। ज्येष्ठमास में विशेष ज्येष्ठद्वन्द् मध्यमं संप्रदिष्टं त्रिज्येष्ठ चेन्नेव युक्त कदापि। केचित्सूय वह्नल्रिंगं प्रोह्म चाहुनेंवान्योन्यं ज्येष्ठयो: स्याद्विवाह: ॥ १५॥ अन्वयः--ज्येष्ठद्न्द्दं मध्यमं संम्प्रदिष्टम्, त्रिज्येष्ठ चेत, (तदा) कदापि नव युक्त स्यात्ू, केचित (आचार्याः) वह्लिगं सूर्य प्रोह्मा चविवाह आहुः। किन्तु अन्योन्यं ज्येष्ठयो: (कन्यावरयो:) विवाह: नव (शुभः) स्थात ॥ १५॥ विवाह में ज्येष्ठ महीना और ज्येष्ठ वर अथवा ज्येष्ठ महीना और ज्येष्ठ कन्या, ये दो ज्येष्ठ मध्यम कहे गये हैं, अर्थात् शुभ वा अशुभ नहीं हैं और ज्येष्ठ कन्या, ज्येष्ठ वर और ज्येष्ठ महीना, ये तीन ज्येष्ठ तो किसी तरह से भी श्रेष्ठ नहीं हैं । कोई आचार्य कहते हैंकि कृत्तिका नक्षत्र में स्थित सूर्य कोछोड़कर ज्येष्ठ मास में ज्येष्ठ वर वा ज्येष्ठ कन्या का विवाह उचित नहीं है। अर्थात् कृत्तिका में जब सूर्य रहते हैं तब ज्येष्ठ में भी ज्येष्ठ वर अथवा ज्येष्ठ कन्या का विवाह शुभ होता है। ज्येष्ठ वर और ज्येष्ठ कन्या का विवाह तो कभी भी शुभ नहीं होता ॥ १५॥। विवाहादिविशेष का निषेध सुतपरिणयात् षण्मासान्तः सुताकरपीडनं न च निजकुले .तह॒द्वा मण्डनादपि सुण्डलम । न च सहजयोदयेभ्रात्रो: सहोदरकन्यके न सहजसुतोद्माहो5ब्दाडूं शुभे न पितृक्रिया ॥ १६॥ अन्वयः--सुतपरिणयात् षण्मासान्त: सुताकरपीडनं न, च तद्गवत् निजकुले मण्डनात् मुण्डनं आप न, च(तथा) सहजयो: भ्रात्रो: सहोदरकन्यके न देये, अब्दार्ध सहजसुतोद्वाह: न, तथा शूभे पित॒क्रिया न (कार्या) !। १६॥ एक कुल में किसी लड़के के विवाह के बाद छ: महीने के भीतर किसी लड़की का विवाह और किसी लड़के या लड़की के विवाह के बाद छः महीने के भीतर किसी का मुण्डन न कराना चाहिए, अर्थात् लड़की के विवाह के बाद लड़के का विवाह और मुण्डन के बाद विवाह कराना चाहिए । सगे दो भाइयों केसाथ सगी दो बहनों का विवाह, छः महीने के भीतर ही सगे मुह॒त्तचिन्तामणि १०६ दो भाइयों का विवाह, छः महीने के भीतर सगी दो बहिनों का विवाह नहीं कराना चाहिए अर्थात् सौतेले भाइयों और सौतेली बहिनों का करा सकते हैं । विवाहादि शुभ कार्यों में पितृश्नाद्धाद न करना चाहिए, अर्थात् ऐसे समय में विवाह आदि की लग्त ठीक करना चाहिए कि जिसमें श्राद्ध का दिन न पड़े ॥ १६|| विपत्ति में विवाह का विचार वध्वा वरस्यापि कुले त्रिपुरुषे नाशं ब्रजेत् करचन नि३चयोत्तरम् मासोत्तरं तत्र विवाह इष्यते शान्त्याथवा सुतकनिगंसे परेः ॥ १७॥ अन्वयः--वध्वा: अपि वा वरस्य तिपूरुषे कुले, निश्चयोत्तरम्,यदि कश्चन नाशं ब्रजेत् तत्र मासोत्तरं विवाह इष्यते, अवथा परे: सूतकनिगंमे शान्त्या विवाह: देष्यते ॥| १७ ॥। विवाह का निश्चय होने पर यदि वर अथवा कन्या के वंश में तीन शान्ति* करके विवाह करे तो शुभ होता है, अथवा यदि आवश्यक हो तो पुरुष के मध्य में कोई मर जाय तो उसके मरणदिन से महीने भर के बाद अपने वर्ण के अनुसार अशौच व्यतीत हो जाने पर शान्ति करके विवाह करे, यह अन्य आचायें कहते हैं ।| १७ ॥। उक्त विषय पर विद्येष चूडा-बरतं चापि विवाहतो ब्रताच्चूडा च नेष्टा पुरुषत्रयान्तरे । वर्धूप्रवेशाच्चसुताविनिगंमः षण्मासतो वाब्दविभेदतः शुभः ॥ १८॥। अन्वयः--पुरुषत्रयान्तरे विवाहतः चूडा नेष्टा च ब्रत॑ अपि (नेष्टम्) च तथा ब्रतात् चूडा अपि नेष्टा, च (तथा ) वधूप्रवेशात् सुताविनिरगंमः (नेष्ट:) षण्मासतः पर वा ७>> हर(५ २२3 ५५०७-३८ ब>> ं92946 कु द2५ 23 कनुरके. ०००० & ---न्च्क हा ७ >>>चद्धे२२2०-2०: -कक अब्दविभेदत: शुभ: स्यात् ॥ १८ ॥। किसी का विवाह होने के बाद छः महीने के भीतर उसी कुल में तीन पीढ़ी के अन्दर किसी का मुण्डन और यज्ञोपवीत शुभ नहीं होता । तथा किसी का मुण्डन किसी का यज्ञोपवीत होने के बाद छः महीने के भीतर शुभ नहीं होता तथा वधू-प्रवेश होने केबाद छः महीने के भीतर किसी का विवाह शुभ नहीं होता । यदि आवश्यक हो तो संवत्सर के भेद से छः महीने के भीतर भी करना चाहिए। यथा माघ में किसी का विवाह हुआ हो #याज्ञवल्क्य-संहिता में कही हुई गणेश को पूजा । | विवाह प्रकरण १०७ और संवत्सर बदलने के बाद वेशाख में उसी कुल में किसी का मुण्डन या यज्ञोपवीत हो तो वह शुभ है। ऐसे ही उक्त संपूर्ण विषयों में जानना चाहिए ॥ १५॥
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