अन्बयः--हेमन्ततौ दिनकृति (सूर्य) पिण्डीभूते (सति), तपसमये अर्धास्ते (सति) जलधरमालाकाले सम्पूर्णास्ते [सूर्ये सति ]गोधूलि: स्यात्, एवं त्रेधा [गोधूलि: |सकलशभकार्यादौं योज्या ॥ १०० ।। हेमन्त ऋतु से यहाँ प्रयोजन शीतंकाल से है, जाड़े के चार महीनों में कुंहिरा आदि से ढककर सायंकाल में जब सूर्य भात के गोले के समान स्वच्छ तेजरहित देख पड़े तब, और चेत्रादि गर्मी के चार महीनों में सूर्य केआधे अस्त हो जाने पर और वर्षाकाल अर्थात् श्रावण आदि चार महीनों में सूर्य के सम्पूर्ण अस्त हो जाने पर गोधूलि होती है। यह गोधूलि का समय संपूर्ण कार्यों मेंशुभ होता है। गोधूलिपद का अर्थ यह है कि जब सायं काल में इकट्ठी होकर वन से घर की ओर आती हुई गौओं के खुरों से उठी हुई धुलि से आकाश भर जाता है, उस समय का नाम गोघूलि काल है ।॥। १००॥ गोधलि समय सें त्याज्य दोष अस्तं यात गुरुदिवसे सौरे साक लग्नानमृत्यौ रिपुभवने लग्ने चेन्दो । कन्यानाशस्तनुमदसृत्युस्थे भौमे बोढ््लाभे धनसहजे चन्द्रे सोख्यम् ॥ १०१॥ अन्वयः--गुरुदिवसे अस्त याते (सूर्य), सौरे सार्क गोधूलि:ः भवति लग्नात् मृत्यौ रिपुभवने, च लग्ने इन्दौ कंन्यानाश: स्यात् तथा तनमदसृत्यूस्थे भौमे वोढु: मृत्यु: स्यात्, लाभे धनसहजे चन्द्रे (सति) सौख्यं भवेत् ॥ १०१ ॥
Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.