Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi
स्वोच्चे स्वभे स्वमैत्रे वा स्वांश वर्गोत्तमे गुरु: । रिष्फाष्टतुयंगो5पीष्टो नीचारिस्थ: शुभोध्प्यसत् ॥ ४७॥ अन्वयः--गुरु: स्वोच्चे स्वभे स्वमैत्रे वा स्वांशे रिष्फाष्टतुयेंगोईपि इष्ट: स्यात् । तथा नीचारिस्थ: शुभो5पि असत् स्यात् ॥ ४७ ॥। बारहवें, आठवें वा चौथे स्थान में भी स्थित. बृहस्पति यदि स्वोच्च, सस््वराशि, स्वमित्रराशि, स्वनवांश वा वर्गोत्तम में हो तो शुभ हो जाता है और शुभ भी बृहस्पति यदि अपने नीच स्थान में या अपने शत्रु के स्थान मे स्थित हो तो वह अशुभ हो जाता है ॥ ४७ ॥
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