Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 5 · · Verse 25
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

संशुद्धे मृतिभवने त्रिकोणकेन्द्रव्यायस्थे: शुभखचर:ः कवीज्यलग्ने । पापाख्येररिसहजायगेहसंस्थलंग्नस्थे त्रिदशगुरों शुभावहः स्थात्‌ ॥ २५॥ अन्वयः--मृतिभवने संशुद्धे, शुभखचरै: त्रिकोणकेन्द्रत्यायस्थे,, कवीज्यलग्ने, पापाख्यै: अरिसहजायंगेहसंस्थै:, त्रिदशगूरौ लग्नस्थे, (कर्णवेध:) शुभावह: स्यात्‌ ॥ २५॥ लग्न से आठवें स्थान में कोई ग्रह न हो, नवें, पाँचवें, पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, तीसरे, और गेरहवें स्थान में शुभग्रह हों; तीसरे, छठे, गेरहवें स्थान में पापग्रह और लग्न में बृहस्पति हों; वृष, तुला, धनु वा मीन लग्न हो तो बालक का कर्णवेध शुभ होता है ॥ २५ ॥।

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