Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi
श्रुतित्रयमृवृक्षिप्र श्रवस्वाता सिंताम्बरे । मध्यं च मुलादितिभे पितृभिश्रे परेष्वसत् ॥ २॥ अन्वयः--श्रुतित्रयमृदुक्षिप्र श्ुवस्वाता सिताम्बरे (आद्यं रज: शुभं स्यात्) मूलादितिभे पितमिश्रे मध्यं (स्यात्) परेषु (नक्षत्रेषु) असत् (स्थात्) ॥ २॥ श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, अश्विनी पुष्य, हस्त, रोहिणी, तीनों उत्तरा, स्वाती इन नक्षत्रों में प्रथम रजोदर्शन हो तो शुभ; मूल, पुनर्वंसु, मघा, विशाखा, कृत्तिका इन नक्षत्रों में मध्यम और भरणी, ज्येष्ठा, आर्द्रीि, आश्लेषा, तीनों पूर्वा, इन नक्षत्रों मेंअशुभ होता है । ब्वेत वस्त्र पहिने हुईं स्त्री के प्रथम रजोदर्शन हो तो शुभदायक होता है ॥ २॥।
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