Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 5 · · Verse 17
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

रिक्तानन्दाष्टदर्श हरिदिवसमथोी सौरिभौमाकंवाराँल्‍्लग्नं॑ जन्मक्षेलग्नाष्टमग्‌ हलवगं मीनमेषालिकं च॑ । हित्वा षष्ठात्समे मास्यथ हि सृगदश्ञां पश्चमादोजमासे नक्षत्रे: स्यात्स्थिराख्यः समृदुलघुचरर्बालकान्नाशनं सत्‌ ॥| १७॥ अन्वयः--रिकतानन्दाष्टदर्श, हरिदिवर्सं, सौरिभौमाकंवारान्‌, जन्मक्षेलग्नाष्टमगृहलवगं लग्नं, मीनमेषालिके लग्नं (एतत्‌ सर्व) हित्वा, षष्ठात्‌ समे मासि अथ हि मृगदुशां पञ्चमात्‌ ओजमासे समृदुलघुचरेः (कन्यानां) स्थिराख्ये: नक्षत्र: बालकान्नाशन सत्‌ ॥ १७॥ चौथि, नवमी, चतुर्दशी, प्रीरीवा, छठि, एकादशी, अष्टमी, अमावास्या और द्वादशी तिथि को छोड़ अन्य तिथियों में; शनेहचर, मंगल, रविवार को छोड़ अन्य दिनों में; जन्मराशि वा जन्मलग्स सेआठवीं राशि, आठवाँ नवांश; मीन, मेष और वृश्दिवक को छोड़ अन्य लग्न में; तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित्‌, स्वाती, पुनवंसु, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिष नक्षत्र में; छठे मास से लेकर सम मासों में अर्थात्‌ छठे, आठवें, दशवें इत्यादि मासों में बालकों का और पाँचवें मास से लेकर विषम मासों में अर्थात्‌ पाँचवें, सातवें, नवें, इत्यादि मासों में कन्‍्याओं का अन्नप्राशन शुभ होता है सो भी शुक्लपफक्ष में और दोपहर से पूर्व होना चाहिए ॥ १७॥।

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