वज्च शुक्रे5ब्जे सुमुक्ता प्रवाल॑ भौमेडईगौं गोमेदमार्का सुनीलम् । केतो बड्यं गुरो पुष्पकं ज्ञे पातिः प्राहमाणिक्यमर्क तु मध्ये ॥ ९॥ अन्वयः--शुक्रे वजन, अब्जे सुमुक्ता, भौमे प्रवालं, अगौ गोमेदं, आकौ' सुनीलं, केतौ वेड्य, गुरौ पुष्पकं, ज्ञे पाचि: (इति) प्राक् (क्रमेण रत्नानि धार्याणि) अर्कें भध्ये माणिक्यं (धाय॑म्) ॥ & ।। नव कोष्ठोंवाला एक सोने का यन्त्र बनवाकर उसके पूर्व कोष्ठ में शुक्र की प्रसन्नता के लिएं हीरा, आग्नेय कोष्ठ में चन्द्रमा की प्रसन्नतां के लिए मोती, दक्षिण कोष्ठ में मंगल की प्रसन्नता केलिए मूँगा, नैऋत्य कोष्ठ में राहु की प्रसन्नता के लिए गोमेद, पद्चिचम कोष्ठ में छानेरचर की प्रसन्नता के लिए नीलम, वायब्य कोष्ठ में केतु की प्रसन्नता के लिए वैडयं, उत्तर कोष्ठ में बृहस्पति की प्रसन्नता के लिए पुखराज, ईशान कोष्ठ में बुध की प्रसन्नता के लिए मरकत मणि और मध्य कोष्ठ में सूर्य की प्रसन्नता केलिए माणिक्य जड़ाकर धारण करे ॥ ९॥।
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