Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 4 · · Verse 10
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

ग़ारुत्मकं पुष्पकवज्जनीलम्‌ । माणिक्यमुक्ताफलविदुमाणि._ गोमेदबड्यंकमकंतः स्यूरत्नान्यथोी ज्ञस्य घुदे सुबर्णम्‌ ॥ १० ४ धाय॑ लाजावत्तंक॑ राहुकेत्वो रोप्यं शुक्रेन्द्रोन्‍च मुक्ता गुरोस्तु लोह मन्दस्यारभान्वो: प्रवाल॑ तारा जन्मर्क्षत्त्रिरावृत्तितःस्यात्‌॥ ११४ अन्वयः--माणिक्यमुक्ताफलविद्रुमाणि, गारुत्मक, पुष्पकवज्ञनीलं, गोमेदवेड्येकम्‌ । (क्रमण) अकंत: सकाशात्‌ रत्नानि (धार्याण) अथो श्ञस्य मुदे सुवर्णम्‌ (धायंम्‌) राहुकेत्वो: (मुदे) लाजवतंक धाय॑म्‌, शुक्रेन्द्रीं: रौप्यं, गुरोश्च मुक्‍ता, तु (तथा ) मन्दस्य लोह, आरभान्वोः प्रवाल (धाय॑म्‌ )तथा जन्मर्क्षात्‌ त्रिरावृत्तित: तारा स्यात्‌ ॥ १०-११ ॥ माणिक्य, मोती, मूँगा, मरकत, पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद, बेड ये प्रत्येक रत्न, सूर्यादि प्रत्येक ग्रहों की प्रसन्नता के लिए धारण करना चाहिए । बहुमूल्य रत्न न मिलें तो अल्पमूल्य वस्तुएँ धारण करने को कहते हैं। बुध की प्रसन्नता के लिए सुवर्ण, राहुं और केतु की प्रसन्नता के लिए लाजावरत॑ मणि, शुक्र और चन्द्रमा की प्रसन्नता के लिए चाँदी, बृहस्पति की प्रसन्नता के लिए मोती, शनैश्चर की प्रसन्नता के लिए लोहा, मंगल और सूरये की प्रसन्नता केलिए मूँगा धारण करना चाहिए। अब तारा कहते हैं। जन्मनक्षत्र सेदिननक्षत्र तक तीन आवृत्ति करने से तारा सिद्ध होती है, अर्थात्‌ जिस दित जिसकी तारा विचारना हो, उसके जन्मनक्षत्र से उस दिन के नक्षत्र तक गिने, जितनी संख्या हो उसमें नव का भाग देने पर जितने दोष रहें वही तारा होगी ।॥ १०-११ ॥।

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