Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 4 · · Verse 12
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

जन्माख्यसंपद्धिपद: . क्षेमप्रत्यरिसाधका:ः । वर्धभैत्नातिमैत्राः स्पुस्तारानामसदृकक्‍्फलाः ॥ १२॥ अस्ययः--जन्माख्यसंपद्विपद: क्षेमप्रत्यरिसाधका: वधमैत्रातिमैत्ा: (एता) नाम-पदकफला: तारा स्युः ॥ १२ ॥। एक शेष हो तो तारा का नाम जन्मक्ष, दो शेष हों तो संपत्‌ू, तीन शेष हों तो विषत्‌, चार शेष हों तो क्षेम, पाँच शेष हों तो प्रत्यरि, छः शेष हों तो साधक, सात शेष हों तो वध, आठ शेष हों तो मैत्र, नव शेष हों तो अतिमैत्र होता है। ये सब तारा नाम के समान फल देनेवाली होती हैं ॥ १२ ॥।

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