Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 4 · · Verse 13
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

मृत्यो स्वर्ण तिलान्विपक्चपि गुड़ श्ञाकं त्रिजन्मस्थयों दद्यात्प्र्यरितारकासु लवणं सर्वे विपत्प्रत्यरि: । मृत्युइचादिसपयंये न शुभदो<थंषां द्वियोयेंडशका- नादिध्रान्त्यतृतोयका अथ शुभाः सर्वे तृतीये स्मृता: ॥ १३॥ अन्वयः--मृत्यो (वधतारायां) स्वर्णतिलान्‌ दद्यातू, विपदि (तारायां) गुड, त्रिजन्मसु शाकं, प्रत्यरितारकासु लवणं दद्यात्‌ । (अथ) आदिसपर्यये विपत्‌, प्रत्यरि:, मृत्युश्च, सबब: न शुभद: । अथ एषां |विपत्परत्यरिमृत्यूनां ] द्वितीये [द्वितीयावत्तो] आदिप्रान्त्यतृतीयका: अंशका: (क्रमेण) न (शुभदाः) अंथ तृतीये [पर्यये] सर्वे शभाः समता: ॥ १३ ॥। शृत्युनामक सातवीं तारा हो तो सुंबर्णयुक्त तिलों का, विपतृनामक तीसरी तारा हो तो ग्रुड़ का, जन्मसंज्ञक तारा में शञाक का ओर प्रत्यरिनामक पाँचवीं तारा होतोनमक का दान करने से तारादोष ज्ञान्त होता है। अब तारादोष का दूसरा परिहार कहते हैं। जन्मनक्षत्र से सत्ताइसवें नक्षत्र तक तीन आवृत्ति होती हैं, अठारहवें तक दो आवृत्ति और नवें नक्षत्र तक एक आवृत्ति होती है। पहिली आवृत्ति में विपत्‌, प्रत्यरि, मृत्यु अर्थात्‌ तीसरी, पाँचवीं, सातवीं तारा सम्पूर्ण अशुभ है। दूसरी आवृत्ति में इन्हीं तीनों ताराओं का पहिला, दूसरा, तीसरा अंश शुभ नहीं होता अर्थात्‌, तीसरी तारा के पहिले बीस अंश अशुभ और चालीस अंज शुभ होते हैं। पाँचवीं तारा में मध्य के बीस अंश अशुभ और आदि के बीस अंश तथा अंत के बीस अंश शुभ होते हैं । सातवीं तारा में अन्त के बीस अंश अशुभ और आदि के चालीस अंश शुभ होते हैं । तीसरी आवृत्ति में तीसरी, पाँचवीं, सातवीं तारा सम्पूर्ण शुभ होती हैं ॥। १३॥।

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