Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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पापान्तः पापयुगद्यने पापाच्चन्द्र: शुभोध्प्यसत् । शभांशे चाधिमित्रांशे गुरुदृष्टोह्शुभोषपि सत् ॥ ७४७ अन्वयः--चन्द्र: पापान्त: पापयुक, पापात् यूने, शुभोष्पि असत् |अशुभः ), वा शुभांशे, अधिमित्रांशे, वा गुरुदृष्ट', अशुभो5पि सत् [शुभः ] (स्थात्) ॥ ७ ॥। दो पापग्रहों के मध्य में स्थित, अथवा पापग्रहसंयुक्त, अथवा पापग्रह के स्थान से सातवें स्थान में स्थित शुभ भी चन्द्रमा अशुभ फल देता है। और यदि शुभग्रहों के नवांश में अथवां अंपने अधिमित्र के नवांश में स्थित हो और बृहस्पति देखता हो तो अशुभ भी चन्द्रमा शुभ फल देता है ॥ ७।॥।
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