Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 4 · · Verse 6
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्वयः--जस्मक्षें ग्रहे निधनं, जनिभतः ग्रहणे घातः, क्षतिः, श्री:, व्यथा, चिन्ता, सौख्य-कलत्नदौस्थ्यमृतयः, माननाशः, सुखं, लाभः, अपाय इति क्रमात्‌ स्यु: |. तदशुभध्वस्त्ये जप:, स्वर्णगोदानं, शान्ति, अथो परे [आचार्या:] अशुभदं ग्रह नो वीक्ष्यं आहु: ॥ ६.।। जिसके जन्मनक्षत्र में सूर्य या चन्द्रमा का ग्रहण हो उसका मरण होता है । जन्मराशि से लेकर बारह राशियों में ग्रहण हो तो इस क्रम से घातादि फल होता है, अर्थात्‌ जन्मराशि में चन्द्रमा वा सूर्य का ग्रहण हो तो शरीर-पीड़ा, जन्मराशि से दूसरी राशि में हो तो हानि, तीसरी में लक्ष्मी, चौथी में व्यथा, पाँचवीं में पुत्रादि की चिता, छठी में सौख्य, सातवीं में सत्रीमरण, आठवीं राशि में अपना मरण; नकीं राशि में माननाश, दशवीं राशि में सुख, गेरहवीं राशि में लाभ और बारहवीं राशि में मरण होता है । चन्द्र-सूये-ग्रहण दोष के नाश के लिए त्यम्बकादि मन्त्रों काजप, सोने वा गौ का दान यही शान्ति है। अशुभ फल देनेवाले ग्रहण की नहीं देखना चाहिए, ऐसा कोई आचार्य कहते हैं ॥| ६ ॥।

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