Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 4 · · Verse 5
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

स्वजन्मराशेरिह वेधमाहुरन्ये ग्रहाधिष्ठितराशितः सः। हिमादिविन्ध्यान्तर एवं वेधो न सर्वदेशेष्विति काइयपोक्ति: ॥ ५॥ अन्धयः--इह अन्य (आचार्या:) स्वजन्मराशे: वेर्ध आहुः: स वेध: ग्रहाधिष्ठित-राशित एवं तथा हिमाद्विविन्ध्यान्तरे [देशे] एव ज्ञेयः, सर्वदेशेषु न इति काश्यपोक्ति: ॥ ५॥। नारदादि आचार्यों ने जन्मराशि से उक्त दोनों वेध कहे हैंऔर कश्यपादि आचार्यों ने जिस राशि में ग्रह स्थित हो उस राशि से उक्त दोनों वेध कहे हैं। यथा जन्मराशि से छठे स्थान में स्थित सूर्य शुभ होता है, परन्तु जिस राशि में वह स्थित हो उससे बारहवीं राशि में शनि को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो बिद्ध अर्थात्‌ शुभ भी अशुभ हो जांता है। ऐसे ही जन्मराशि से बारहवें स्थान में स्थित सूर्य अशुभ होता है, परन्तु वह जिस राशि में स्थित हो उससे छठी राशि में शनि को छोड़ अन्य ग्रह यदि स्थित हों तो शुभ हो जाता है। ऐसे ही चन्द्रादि के भी दोनों प्रकार के वेधों कोजानना चाहिए । इन वेधों कादोष हिमालय और बिन्ध्याचल के मध्यवर्ती देशों में ही होता है, अन्य देशों में नहीं, ऐसा कद्यपजी का वचन है। परन्तु बृहस्पतिजी ने क्रमवेध जन्मराशि से और विपरीतवेंध ग्रह-स्थान से कहा है। हमारी समझ में भी यही माननीय है ॥ ५॥

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