ारुभि: निशादर्थे लाजाकुष्ठबलाप्रियंगुघनसिद्धा पुडखालो ध्रयुतेज लेनिगदितं स्नान ग्रहोत्थघहृत् । धेनुःकम्ब्वरुणो वृषइच कनक॑ पीताम्बर घोटकः इवेतो गौरसिता महासिरज इत्येता रवेदंक्षिणा: ॥ १६॥ अन्वयः--लाजाकुष्ठबला प्रियंगुघनसिद्धार्थं: _निशादारुभि: पुद्धालो भ्रयुतें: जले: ग्रहोत्याघहत् स््नानं निगदितम्, धेनुः, कम्बु, अरुणों वृष: च कनकं, पीताम्बरं, बरं, श्वेतः घोटक:, असिता गौः, महासि:, अजः इति एंता: रवे: (क्रमेण ) दक्षिणा: (ज्ैया:) ।॥ १६ ।। लज्जावती, कट, बरियारा, काकुनि, मुस्ता, सरसो, हल्दी, देवदारु, शरपुंखा, लोध इन ओषधियों से युक्त जल से स्तान करना ग्रहों केदोष का हरण करनेवाला कहा गया है । अब सूर्यादि ग्रहों की दक्षिणा कहते हैं । सूर्य की प्रसन्नता के लिए धेनु,; चन्द्रमा की प्रसन्नता के लिए शंख, मंगल की प्रसन्नता के लिए लाल बैल, बुध की प्रसन्नता के लिए 'सुवर्ण, बृहस्पति की प्रसन्नता के लिए पीताम्बर, शुक्र की प्रसन्नता के लिए रवेत घोड़ा, शर्नेइचर की प्रसन्नता के लिए काली गौ, राहु की प्रसन्नता केलिए तलवार और केतु की प्रसन्नता केलिए बकरा ब्राह्मण को देना चाहिए ॥ १६ ॥।
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