Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi
अन्वयः--अयनांशा: खरसाहताः च स्पष्टाकंगत्या विहता: (लब्धेः) दिनादे: मेषादितः प्राक चलसंक्रमाः स्युः, ते दाने तथा जपादो बहुपुण्यदा: ॥। ८ ।। साठ से गुणे हुए अयनांशों' में सूर्य की स्पष्ट गति से भाग देने पर जितने दिनादि लब्ध हों, मेषादि संक्रान्तिकाल से उतने ही दिनादि पूर्व चलसंक्रम अर्थात् अयन संक्रान्तियाँ होती हैं । वे अयन' संक्रान्तियाँ दान, जप, होम और श्राद्धादि पुण्य कर्म करने के लिए बहुत पुण्यदायक हैं ।। ९ ।।
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