संक्रान्ति का पुण्यकाल संक्रान्तिकालादुभयंत्र नाडिकाः पुण्या सताः षोडशघोडशोष्णगोः । अन्वयः--उष्णगो: (यः संक्रान्तिकाल: तस्मात्) संक्रान्तिकालातू उभयत्र षोड्श षोडष नाडिका: पुण्या मता: । सोलहसूर्य की संक्रान्ति जिस समय हो उससे पहले और परचात् सोलह दण्ड पृण्यकाल मानना चाहिए । गणित से पुण्यकाल जानने की यह रीति है कि सूर्य केबिम्ब की कलाओं को साठ से गुणा करके सूर्य की गति का भाग देने से जो लब्ध हो वही संक्रान्ति से पूर्व-पर पुण्यकाल होता है । रात्रि में संक्रान्ति काविशेष पुण्यकाल निश्ीथतोहर्वागपरत्र संक्रमे पूर्वापराहान्तिमपूर्व भागयोः ॥ ५॥ अन्बयः--निशीथत: अर्वागपरत्न संक्रमे (सति) (क्रमेण) पूर्वापराहान्तिमपूर्व-भागयो: (पुण्यघटिका भवन्ति ) ।। ५ | यदि आधी रात्रि से पूर्व संक्रान्ति हो तो पूर्व दिन का उत्तरा्ध पुण्यकाल और यदि आधी रात्रि के उपरांत संक्रान्ति हो तो पर दिन का पूर्वाद्धे पुण्यकाल होता है ॥ ५॥
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