Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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शिवो न॒युग्मे द्वितनों व देव्य: क्षुद्राइचरे सर्व इसमे स्थिरक्षें । पुष्पे ग्रहा विध्नपयक्षसपंभूतादयो5न्त्ये श्रवण जिनइच ॥ ६२ ।॥। इति मुहतंचिन्तामणों नक्षत्रप्रकरणं समाप्तम् ॥ २॥ शिव की प्रतिष्ठा युगम राशि लग्न में न करे; दोनों तनु में देवी की; क्षुद्रदेवताओं की चर नक्षत्र में; सभी देवताओं की स्थिर नक्षत्र में; ग्रह-प्रतिष्ठा पुष्य में; विघ्नपति, यक्ष, सर्प, भूत आदि की प्रतिष्ठा रेवती में; जैन (जिन) की श्रवण में — इति नक्षत्रप्रकरणं समाप्तम् ॥ २॥
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