Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 2 · · Verse 30
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

त्वाष्ट्रान्मित्रकभाद्दये5म्बुपलघुश्रोत्रे शिरामो क्षण भौसाकेज्यदिने विरेकवमनायं स्यादबुधाकी विना। मित्रक्षिप्रचर ध्रवे. रविशुभाहे लग्नवर्गं विदो जीवस्थापि तनौ गुरो निगदिता धमंक्रिया तदबले ॥ ३०॥ अन्वयः-त्वाष्ट्रान्म ित्रकभा दढ्येउम्बुपलघुश्रोत्रिं, भौमाकज्यदिने शिरामोक्षणम्‌ (कार्यम) । बुधार्की विना [पूर्वोक्तनक्षत्रेष | विरेकवमनादं (शुभ) स्यात्‌ । मित्रक्षिप्रचर ध्रुवे, रविशुभाहे, विद: जीवस्य अपि लग्नवगें, गुरौ तनौ, तद्बले [गुरुबले | धर्मक्रिया (शभा) निगदिता ॥| ३० ॥। चित्रा, स्वातीं, अनुखधा, ज्येष्ठा, रोहिणी, मृगशिरा, शतभिष, अदिवनी, पुष्य, हस्त, अभिजित्‌ और श्रवण नक्षत्र में; मंगल, रविवार, बृहस्पति दिन में शिरामोक्षण अर्थात्‌ फस्त खोलवाना शुभ होता है। बुध और शनैशचर को छोड़ अन्य दिनों में और इन्हीं पूर्वोक्त नक्षत्रों मेंविरेक-वमन आदि शुभकारक होता है । अनुराधा, अश्विनी, पुष्य, हस्त, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, तीनों उत्तरा और रोहिणी नक्षत्र में; रविवार, सोमवार, बुध, बृहस्पति, शुक्र दिन में; बुध और बृहस्पति के लग्न वा षड़वर्गं में; लग्न में बृहस्पति के रहतें और कर्त्ता का बृहस्पति बली होने पर धर्मक्रिया काआरम्भ करना शुभ होता है ॥ ३०॥।

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