Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 2 · · Verse 1
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

ज्योरगा नासत्यान्तकवह्तिधातृशशभदुद्रादिती ऋक्षेशञा: पितंरो भगो5यं मरवी त्वष्टा समीरः क्रमात्‌ । शक्राग्नी खलुमित्र शक्रनिऋति: क्षीराणि विशवेविधिगॉविन्दोवसुतोयपाजचरणाहिबुंध्ल्यपूषाभिधा: ॥ १॥ अन्ययः--ना सत्यान्तकचह्लिधातृशशभुद्र॒द्रादितीज्यो रंगा, पितर:, भंग:, अरय॑मरवी, त्वष्टा, समी र:, शक्राग्नी, मित्र:, शक्र: निऋति:, क्षीराणि, विश्व, विधि:, गोविन्द:, वसुतोयपाजचरणाहिर्बुध्न्यपषाभिधा: (एते) क्रमात ऋक्षेशा: (ज्ञेया:) ॥ १॥ अधश्विनी नक्षत्र के स्वामी अश्विनीकुमार, भरणी के यभराज, क्ृत्तिका के अग्नि, रोहिणी के ब्रह्मा, मृगशिरा के चन्द्रमा, आर्द्रों केरुद्र, पुन्वंसु के अदिति, पुष्य के बृहस्पति, आइ्लेषा के सपं, मघा के पितर, पूर्वाफाल्गुनी के भग देवता अर्थात्‌ सूर्यविशेष, उत्तराफाल्गुनी के अर्यमा अर्थात्‌ सूयेविशेष, हस्त के सूर्य, चित्रा के विश्वकर्मा, स्वाती के वायु, विशाखा के इन्द्र और अग्नि, अनुराधा के मित्र अर्थात्‌ सूर्यविशेष, ज्येष्ठा के इन्द्र, मूल के के राक्षस, पूर्वाषाढ़ केजल, उत्तराषाढ़ के विश्वेदेव, अभिजिंत के ब्रह्मा, श्रवण के विष्णु, धनिष्ठा के वसु, शतभिष के वरुण, पूर्वाभाद्रपरद के अजचरण अर्थात्‌ रुद्रविशेष, उत्तराभाद्रपद के अहिर्बुध्न्य अर्थात्‌ रुद्रविशेष, रेवती के पूृषा अर्थात्‌ सूर्यविशेष स्वामी हैं ॥ १॥

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