Bṛhat Parāśara Horā Śāstra
Chapter 60 · atha śukrāntardaśāphalādhyāyaḥ · अथ शुक्रान्तर्दशाफलाध्यायः · Verse 36
Sanskrit · DevanāgarīBṛhat Parāśara Horā Śāstra manuscript tradition
शुक्रस्यान्तर्गते राहौ केन्द्रलाभत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा शुभसंदृष्टे योगकारकसंयुते
IAST Transliteration
śukrasyāntargate rāhau kendralābhatrikoṇage | svocce vā śubhasaṃdṛṣṭe yogakārakasaṃyute
TranslationsTwo-source verified
English

Effects like great enjoyment, gain of wealth, visits of friends, successful journeys, gain of cattle and land etc., will be derived in the Antardasa of Rahu in the Dasa of Venus, if Rahu be in kendra or trikona or the 11th, be in his sign of exaltation or in his own sign or be associated with or aspected by benefics.

Hindi

राहु अन्तर्दशा फल :- शुक्रस्यान्तर्गते राहौ केन्द्रलाभत्रिकोणगे । स्वोच्चे वा शुभसंदृष्टे योगकारकसंयुते ।।36।। तदभुक्तौ बहुसौख्यं च धनधान्यादिलाभकृत्‌ । इष्टबन्धुसमाकीर्णं भवनं च समादिशेत्‌ ।।37।। यातुः कार्यार्थसिदिधः स्यात्पशुक्षेत्रादिसम्भवः । लग्नाद्युपचये राहौ तदभुक्तिः सुखदा भवेत्‌ ।।38।। शत्रुनाशो महोत्साहो राजप्रीतिकरा शुभा । भुक्त्यादौ पञ्चमासांश्च विरामे ज्वरपित्तकृत्‌ ।।39।। कार्यविघ्नमवाप्नोति संचरे च मनोव्यथा । परं सुखं च सौभाग्यं महाराज इवाश्नुते ।।40।। नैऋतीं दिशमाश्रित्य प्रयाणं प्रभुदर्शनम्‌ । यातुः कार्यार्थसिदिधः स्यात्‌ स्वदेशे पुनरेष्यति ।।41।। उपकारो ब्राह्मणानां तीर्थयात्राफलं भवेत्‌ । शुक्र में राहु की अन्तर्दशा हो तथा राहु लग्न से केन्द्र, त्रिकोण, लामस्थान, उच्च, शुम ग्रह से दृष्ट या योगकारक ग्रह से युक्त हो तो सुख, धन-धान्य का लाम, घर में इष्ट मित्रों का समागम, यात्रा में सफलता, पशुधन व अचल सम्पत्ति की वृद्धि होती है। यदि राहु लग्न से उपचय (3.6.10.11) भावों में हो तो अन्तर्दशा सुखदायक होती है। इस अन्तर्दशा में शत्रुओं का नाश, अधिक उत्साह, राजा से प्रीति या अधिकारी वर्ग की प्रसन्नता, आदि फल पहले पाँच मासों में होते हैं। लेकिन अन्तर्दशा के अन्त में ज्वर, अपच, अम्लपित्तता, कार्यो में विघ्न, यात्रा में मानसिक कष्ट होते हैं। शेष सब शुम फल (धन सम्पत्ति) महाराजाओं की तरह प्राप्त होते हैं। नैऋत्य दिशा (दक्षिण पश्चिम) में यात्रा, वहाँ के बड़े लोगों से सम्मान, यात्रा में सफलता, पुनः स्वदेश में आगमन, ब्राह्मणों का उपकार, तीर्थ यात्रा का फल होता है।

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