Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
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Hindi
दैवज्ञ राणग के पुत्र श्रीकेशवार्क (मैंने) अध्ययनमार्गगामिजनों को अर्थरूपदुग्ध के प्रवाहों से तृप्ति करने के लिये पुण्यवानों से सेव्यमान इस वृन्दावन में मुनियों के वचनरूप गायों को दुहा। अर्थात् जैसे तपस्वियों से सेव्यमान वन में मार्ग चलने से खिन्न पथिकों की तृप्ति के लिये गायें दुही जाती हैं उसी प्रकार दूसरे ग्रन्थों के अध्ययनमार्ग में थके हुए लोगों की तृप्ति के लिए मैंने भी सुपुण्यजनों से सेवनीय इस वृन्दावन में मुनिवचनों का सारांश संग्रह कर दिया है ॥ ३ ॥
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