Sanskrit · DevanāgarīVivāha Vṛndāvana manuscript tradition
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Hindi
जैसे अग्नि से जले हुए बीज विफल होते हैं उसी प्रकार कितने (निर्बल ग्रहों के) योग प्रत्यक्ष रहने पर भी विफल होते हैं। तथा--कितने योग जो देखने में नहीं भी आते वे तृणपत्रादि से आच्छादित अग्नि के समान अवश्यही फलप्रद होते हैं। अर्थात् सबल ग्रहों का भी संयोग फलप्रद, और निर्बल ग्रहों का सम्पूर्णयोग भी विफल होता है ॥ १३ ॥
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