HomeLibrarySaravaliCh.32Verse 51
Sārāvalī
Chapter 32 · Ninth House And Effects Thereof · भाग्यचिन्ता नाम टात्रिशोऽऽ्यायः ॥ त्रयरित्रशो · Verse 51
Sanskrit · DevanāgarīSārāvalī manuscript tradition
बन्धुसुहृत्सम्पन्चः “स्थिरचित्तः सोख्यभाक्‌ भवेद्धिवुके ।
भौमामरपूजितयोतृपसेवी देवगुरुभक्तः
गिरिदुर्गतोयकाननविचरणशीलः सुबान्धवः शूर: ।
कुजजीवयोर्युवत्या जायाहीनः पुमान्भवति
त्रिदशगुरुभूमिसुतयोराकाशे पोथिवो विपूलक्रीतिः।
बहुघनजनपरिवारः कमसु तिपुणो भवेत्युरुषः
Translations
English

In analyzing the said effects, the Signs and aspects involved should be skilfully understood according to Shastras and results declared accordingly, so say the learned.

Hindi

यदि जन्म के समय भौम गरु लग्न में हों तो जातक-सचिव, प्रधान, गुणी, धार्मिक कार्यो में की प्राप्तकर्ता तथा प्रतिदिन उत्साही होता यदि चतुथं भाव में भौम-गुरु हों तो जातकत्रन्धु व मित्रों से युक्त, स्थिर चित्त (वा वित्त-धन) वाला, सुखभोगी, राजा का सेवनकर्ता व देवता एवं गुरुओ का भक्त होता है । यदि सप्तम भाव में भौम-गुरु हों तो जातक पर्वत-किला-जल-वन में घूमने वाला, अच्छे बान्धवों से युत, वीर तथा स्त्री रहित होता हैं। यदि दशम भाव में भौम गुरु हों तो जातक राजा, अधिक कीर्तिमान्‌, अधिक धन व परिवार से युत तथा चतुर होता है

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