HomeLibraryPhaladeepikaCh.3Verse 9
Phaladeepika
Chapter 3 · varga-vibhāga · वर्ग-विभाग · Verse 9
Sanskrit · DevanāgarīPhaladeepika manuscript tradition
श्रेष्ठाश्वद्विपवाहनादि विभवं पारावताधिष्ठितः
सत्कीर्तिं यदि देवलोकसहितो भूमण्डलाधीश्वरम् ।
वन्द्यं भूपतिभिः सुरेन्द्रसदृशं त्वैरावतांशास्थितः
सद्भाग्यं धनधान्यपुत्रसहितं भूपं विदध्याद् ग्रहः
IAST Transliteration
śreṣṭhāśvadvipavāhanādi vibhavaṃ pārāvatādhiṣṭhitaḥ satkīrtiṃ yadi devalokasahito bhūmaṇḍalādhīśvaram | vandyaṃ bhūpatibhiḥ surendrasadṛśaṃ tvairāvatāṃśāsthitaḥ sadbhāgyaṃ dhanadhānyaputrasahitaṃ bhūpaṃ vidadhyād grahaḥ
TranslationsTwo-source verified
English

The planet that has attained a Paravatamsa will make the native endowed with very good horses, elephants, vehicles and other princely appendages. The person in whose nativity a planet has reached a Devalokamsa will be a king widely renowned for his good qualities. The planet that has gained an Airavatamsa in a person's nativity will make him a second God Indra fit to be saluted by kings. The planet in a Suralokamsa secures to the native good luck, wealth, corn, children and kingship.

Hindi

ऊपर कितने स्ववर्ग आदि में ग्रह क्या-क्या कहलाता है यह बतलाने के बाद अब इसका फल बताते हैं — यदि कोई ग्रह 'पारिजातांश' में हो तो वह जातक को अनेक गुणों से युक्त, धनी, सुखी, मान-प्रतिष्ठा वाला बनाता है। यदि कोई ग्रह उत्तमांश में हो तो वह उत्तम आचार वाला (कुलक्रमागत शिष्ट, जनानुमोदित रास्ते पर चलने वाला), चतुर और विनयी होता है। यदि किसी जातक का कोई ग्रह गोपुरांश में हो तो उसकी वृद्धि शुभ होती है और उसको गायों का, धन का, खेत का तथा अपने मकान का सुख प्राप्त होता है। यदि ग्रह सिंहासनांश में हो तो मनुष्य राजा का प्यारा हो; या राजा के बराबर हो या राजा ही हो जाय — यह सब परिस्थिति देखकर फलादेश कहना चाहिये। यदि कोई ग्रह पारावतांश में हो तो जातक को श्रेष्ठ घोड़े, हाथी, सवारी आदि प्राप्त हों और वैभव से युक्त हो। यदि कोई ग्रह देवलोकांश में हो तो जातक सत्कीर्ति से युक्त भूमण्डलाधीश (राजा) गवर्नर आदि हो। ऐरावतांश में ग्रह होने से वह साक्षात् इन्द्र के वैभव से युक्त होगा और अनेक राजा उसको सलाम करेंगे। सुरलोकांश का फल भी करीब-करीब ऐसा ही है — धन-धान्य, सौभाग्य, पुत्र सुख से युक्त महाराजा हो। ऊपर जो अधिकाधिक शुभ वर्गों में उत्तम फल बताये गये हैं, इनका शब्दार्थ नहीं लेना चाहिये। केवल भावार्थ लेना चाहिये कि जितना अधिक कोई ग्रह स्ववर्गों में होगा उतना ही सुख-फल दिखाने में समर्थ होगा। केवल एक ग्रह अच्छा होने से न कोई राजा बनता है न कोई एक ग्रह खराब होने से कोई रंक हो जाता है। न सब ग्रह किसी के बनते हैं न सब ग्रह किसी के बिगड़ते हैं — इसीलिये फलादेश करते समय सब ग्रहों के बलाबल का तारतम्य कर अन्तिम नतीजे पर पहुँचना चाहिये। ऊपर के श्लोकों में ग्रहों के बलवान् होने का शुभ फल बताया है। अब ग्रहों के निर्बल होने का फल बताते हैं। दशों वर्गों में बलहीन हो तो मृत्यु हो जावे। यदि नौ में बलहीन हो तो 'नाश' हो, आठ में बलहीन हो तो 'दुःख' उत्पन्न करे। सात में निर्बलता का फल है अनर्थ। छः में सुखहीनता। यदि पाँच वर्गों में बलवान हो तो बन्धुओं का प्यारा। ६ वर्गों में बलवान होने से बन्धुओं में श्रेष्ठ हो। ७ वर्गों में बलवान होने का फल है राजा की कृपा प्राप्त होना। ८ का फल है धनी होना। ९ का फल है राजा होना और दशों वर्गों में बलवान होने से महाराजा होता है। अब राजा महाराजा होते नहीं इस कारण यह अर्थ समझना चाहिये कि जितने अधिक वर्गों में बलवान् हो उतना ही शुभ फल अधिक होगा। यदि ग्रह बालावस्था में हो तो व्यक्ति वृद्धि को प्राप्त हो, कुमारावस्था में ग्रह हो तो जातक को सुख प्रदान करे। यदि ग्रह युवावस्था में हो तो जातक को नृप बना दे, अर्थात् अधिक अभ्युदय करे। यदि ग्रह प्रौढ़ावस्था में हो तो बीमारी पैदा करता है, और वृद्ध अवस्था में मृत्यु पैदा करता है। यहाँ भी शब्दार्थ न लेकर भावार्थ लेना चाहिये — ग्रह यदि बाल हो तो क्रमशः उन्नति, यदि कुमार हो तो बाल से अधिक अच्छा फल, युवा हो तो फल प्रदान करने में पूर्ण शक्तिमान्, प्रौढ़ हो तो भलाई करने में अशक्त, बुराई के लिये उद्यत, और मृत अवस्था में हो तो अत्यन्त निकृष्ट फल देता है।

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