Subtract five times the figures for the Sun from five times the figures for the Moon. If the Tithi represented by the result be an auspicious one in the bright half of a month, progeny is assured to the native (even) without much exertion. But if it be one of the dark half of the month, there is no such possibility. It is by a close examination of the strength of the Tithi — whether it is auspicious or otherwise — in both the Pakshas, bright and dark — that one has to divine the possibility of the native being blessed with issue. During an Amavasya, a Chhidra Tithi, the Vishti Karana or any one of the Sthira-karanas, there will be no issue at all.
अब एक दूसरा प्रकार बताते हैं। सूर्य-स्पष्ट को पाँच से गुणा कीजिये और चन्द्र-स्पष्ट को भी पाँच से गुणा कीजिए, फिर चन्द्र-स्पष्ट की जो पाँच से गुणा क्रिया है उसमें से सूर्य-स्पष्ट ५ के गुणनफल को घटाइये। यह सन्तान तिथि स्फुट हुआ। (हमने 'सुगम ज्योतिष प्रवेशिका' के पृष्ठ ३८ और ३९ पर समझाया है कि सूर्य और चन्द्र के कितने अंश के फासले पर कौन-सी तिथि होती है। तिथि का आधा भाग करण कहलाता है। इस कारण सूर्य और चन्द्र का कितना फासला है यह ज्ञात होने पर करण भी निकाला जा सकता है।) ऊपर बताया गया है कि सूर्य-स्पष्ट ५ के गुणनफल को चन्द्र-स्पष्ट ५ के गुणनफल में से घटाइये; जो उत्तर आवे उससे यह निकालिये कि कौन-सी तिथि निकलती है और कौन-सा करण आता है। ऊपर लिखे प्रकार से शुक्लपक्ष की शुभ तिथि आवे तो बिना यत्न के भी पुत्र प्राप्ति होती है। यदि कृष्णपक्ष की तिथि आवे तो सन्तान की सम्भावना कम रहती है। कृष्णपक्ष की तिथि हो या शुक्लपक्ष की तिथि — शुभ है या नहीं — उसका बलाबल देखकर फल कहना चाहिये। यदि अमावास्या तिथि आवे या छिद्र तिथि आवे तो सन्तान सुख में बाधा होगी। इसी प्रकार यह भी देखना चाहिये कि करण कौन-सा आता है। यदि विष्टि, चतुष्पाद, नागव, किस्तुघ्न या शकुन करण आवे तो भी सन्तान सुख में बाधा उत्पन्न होती है। ऊपर बताया गया है कि अमावास्या या छिद्र तिथि आवे तो शुभ फल नहीं समझना। छिद्र तिथि किसे कहते हैं? चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी और चतुर्दशी छिद्र तिथियाँ कहलाती हैं।
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