Of the two signs having a common lord, if one alone be occupied and contain a less number of benefic dots than the number in the other, the figure in the latter is to be made equal to the former.
त्रिकोण-शोधन के बाद एकाधिपत्य-शोधन किया जाता है। एक स्वामी की दो राशियों (जैसे शुक्र की वृष-तुला, बुध की मिथुन-कन्या, गुरु की धनु-मीन, शनि की मकर-कुम्भ, तथा मेष-वृश्चिक मंगल की) में निम्नलिखित चौदह स्थितियाँ हो सकती हैं — दोनों ग्रहयुक्त, एक ग्रहयुक्त-एक ग्रहहीन, दोनों ग्रहहीन; तथा बिन्दुओं की समानता, अधिकता, न्यूनता या शून्यता के संयोग। नियम: (क) क्रमांक १,२,३,४,७,९,१०,१३,१४ की परिस्थिति में कोई शोधन नहीं — संख्या वैसी ही रहती है। (ख) क्रमांक ५ या ६ (एक ग्रहयुक्त, एक ग्रहहीन — दोनों में समान या ग्रहहीन में अधिक) — ग्रहहीन राशि के सब बिन्दु हटा दीजिये; ग्रहयुक्त की संख्या वैसी ही रहेगी। (ग) क्रमांक ८ (दोनों ग्रहयुक्त — पहली में अधिक, दूसरी में कम): दूसरी राशि में पहली के बराबर संख्या कर दीजिये। (घ) क्रमांक ११ (दोनों ग्रहहीन — समान): दोनों में ० स्थापित करें। (ङ) क्रमांक १२ (दोनों ग्रहहीन — असमान): अधिक वाली राशि में कम वाली के बराबर संख्या रखें। मन्त्रेश्वर का संस्कृत-वाक्य अनेक प्रकरणों में दो अर्थ की संभावना देता है; ओझा ने पाठक-सुविधा के लिये पराशर से अधिक मेल खाते अर्थ अंगीकार किये हैं। एकाधिपत्य-शोधन के बाद प्रत्येक राशि-संख्या को 'राशि-गुणक' से तथा प्रत्येक ग्रह-संख्या (जिस राशि में ग्रह बैठा है उसमें) को 'ग्रह-गुणक' से अलग-अलग गुणा करना चाहिये।
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