When the planet owning the Navamsa is strong, there will be acquisition of wealth without any exertion. If it should be weak, very little wealth accrues. The country of acquisition will be that signified by the sign representing the 10th house or the Navamsa occupied by the lord of the 10th house. But if this sign be occupied or aspected by its lord, he will earn in his own country. The same will be the result if the Navamsa occupied by the lord of the 10th house be an immoveable Rasi. And if the said sign be occupied or aspected by planets other than its lord, the native will earn in a place other than his own native country. Thus ends the 5th Adhyaya on "Profession and Livelihood" in the work Phaladeepika composed by Mantreswara.
नवांश का स्वामी (जो कि पहले श्लोक की व्याख्या में बताया गया है) यदि बलवान् हो तो आसानी से धन-प्राप्ति हो जाती है, किन्तु यदि यह नवांशेश स्वयं दुर्बल हो तो बहुत थोड़े धन की प्राप्ति होती है। अब किस देश में या किस दिशा में धन-प्राप्ति होगी यह विचार करते हैं — (१) दशम स्थान में जो राशि है उसको व्यक्त करने वाले देश और उस राशि की दिशा में धन-प्राप्ति होगी, अथवा (२) दशम का स्वामी जिस नवांश में होगा उस नवांश-राशि से सम्बन्धित देश और उस नवांश-राशि की दिशा में धन-प्राप्ति होगी। मान लीजिये प्रथम श्लोक की व्याख्या में जो उदाहरण-कुण्डली दी गई है — और लग्न बलवान् है तो वृष राशि-सम्बन्धित देश और दिशा में, तथा वृष का स्वामी शुक्र वृश्चिक नवांश में है इस कारण वृश्चिक राशि-सम्बन्धित देश और दिशा में, धन-प्राप्ति होगी। किन्तु एक बात ध्यान में रखनी चाहिये — यदि यह राशि या नवांश-राशि अपने स्वामी से युत या वीक्षित हो तो मनुष्य स्वयं अपने देश में रहकर धनोपार्जन करेगा। यदि दशमेश स्थिर नवांश में हो तो भी जातक अपने ही देश में धनोपार्जन करेगा। किन्तु यदि दशम राशि या दशम-राशीश-स्थित नवांश राशि — इन दोनों राशियों में स्वामी के अतिरिक्त अन्य ग्रह बैठे हों या स्वामी के अतिरिक्त अन्य ग्रह देखते हों — तो अन्य देश में भाग्योदय होता है, अर्थात् अपनी जन्म-भूमि में भाग्योदय नहीं होता; विदेश में जीविका उपार्जन करता है। कुछ अन्य ज्योतिष-ग्रन्थों में यह भी लिखा है कि भाग्येश चर राशि में हो तो विदेश में भाग्योदय; यदि स्थिर राशि में हो तो स्वदेश में भाग्योदय; और यदि द्विस्वभाव राशि में हो तो कभी स्वदेश में, कभी परदेश में, कार्य करने से धन-प्राप्ति या भाग्योदय हो।
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