One ought to declare the acquisition of wealth by any person with reference to the predominance of the Lagna or the Moon as the case may be in his horoscope. The source of such an acquisition will be the father, mother, a foe, a friend, a brother, a wife or a servant, according as the Sun or any of the other planets taken in order occupies the 10th place from the Lagna or the Moon whichever is stronger. His profession will be that prescribed for the lord of the Navamsa occupied by the planet owning the 10th place from the Lagna, from the Moon and from the Sun (severally) whichever is strongest.
धन-प्राप्ति कराने वाला कौन सा ग्रह है? लग्न और चन्द्रमा — इन दोनों में जो बलवान् हो उससे दशम में कौन सा ग्रह है? सूर्य हो तो पिता द्वारा धन-प्राप्ति, चन्द्रमा हो तो माता से, मंगल हो तो शत्रु से, बुध हो तो मित्रों से, बृहस्पति हो तो भाई आदि से, शुक्र हो तो स्त्री से, शनि हो तो नौकरों से। ऊपर रिश्तेदारों का निर्देश मात्र कर दिया गया है। जब ये ज्योतिष की पुस्तकें बनी थीं तब भारतवर्ष में आय के कार्य और साधन बहुत सीमित थे। किन्तु आजकल कारखाने, मशीनरी, इम्पोर्ट, एक्सपोर्ट आदि अनेक साधन नये हो गये हैं। इस कारण सूर्य से केवल पिता ही नहीं कहना, किन्तु सूर्य से जिन-जिन बातों का विचार किया जाता है उन सब साधनों में से एक या अधिक से द्रव्य-प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार चन्द्रमा आदि से समझना चाहिये। यदि लग्न से दशम में बलवान् चन्द्रमा हो तो सफ़ेद वस्तुओं से, जल से उत्पन्न पदार्थों से, चाँदी से, मोती से, जल (समुद्र) से पार देशों से, व्यापार से, जनता के उपयोग में आने वाले पदार्थों से धन-प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों से विविध साधनों द्वारा धन-प्राप्ति कहनी चाहिये। लग्न या चन्द्रमा से दशम में कौन सा ग्रह है — वह ग्रह अपने मार्ग से धन-प्राप्ति करावेगा — यह एक बात बतायी। अब दूसरी बात बताते हैं — यह देखिये कि लग्न, सूर्य और दशम — इन तीनों में बलवान् कौन है। जो इन तीनों में अधिक बलवान् हो उससे दशम राशि कौन सी पड़ती है? उस दशम राशि का स्वामी किस नवांश में है? उस नवांश का स्वामी कौन सा ग्रह है? जो ग्रह आवे उस ग्रह के स्वभाव, साधन से जातक को धन-प्राप्ति होगी। उदाहरण के लिये एक कुण्डली दी जाती है — सिंह लग्न है, सूर्य वृश्चिक में है, और चन्द्रमा मीन में है। मान लीजिये लग्न सबसे बलवान् है तो लग्न से दशम वृष राशि हुई; इसका स्वामी शुक्र — मान लीजिये तुला राशि में ५° का है तो शुक्र वृश्चिक नवांश में हुआ (क्योंकि तुला राशि के ३°-२०' से ६°-४०' तक वृश्चिक नवांश रहता है)। वृश्चिक नवांश का स्वामी मंगल है। इस कारण मंगल के स्वभाव, गुण, साधन और वृत्ति द्वारा धन-लाभ कहेंगे। यदि सूर्य बलवान् हो तो सूर्य वृश्चिक में है — इससे दशम सिंह राशि हुई — इसका स्वामी सूर्य हुआ। मान लीजिये सूर्य २६° का वृश्चिक में है तो कुम्भ नवांश में होने से (क्योंकि वृश्चिक राशि में २३°-२०' से २६°-४०' तक कुम्भ नवांश होता है) सूर्य का नवांशेश शनि हुआ। अतः शनि-स्वभाव, शनि-प्रकृति, शनि-स्वरूप, शनि-सम्बन्धित व्यापार, कार्य, पदार्थों से जातक को लाभ होगा। तीसरा उदाहरण — यदि चन्द्रमा सबसे बलवान् हो तो चन्द्रमा (मीन) से दशम धनु राशि हुई; धनु का स्वामी बृहस्पति। यदि बृहस्पति कन्या में १५° का है तो पञ्चम नवांश में होने के कारण वृष नवांश में है (क्योंकि कन्या राशि में १३°-२०' से १६°-४०' तक वृष का नवांश रहता है), जिसका स्वामी शुक्र है। अतः शुक्र की आकृति, प्रकृति, स्वरूप, स्वभाव, गुण, धर्म वाले व्यक्तियों से तथा शुक्र से सम्बन्धित व्यापारों से लाभ होगा। क्या लग्न, सूर्य, चन्द्र — इनमें जो सबसे बली हो केवल उससे विचार किया जाय? बहुत से ज्योतिषियों का मत है कि तीनों से विचार करना चाहिये, क्योंकि किसी-किसी को तो एक ही प्रकार से धन-लाभ होता है और किसी-किसी को अनेक उपायों और मार्गों द्वारा धन-प्राप्ति होती रहती है।
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