The person born in the Srinatha Yoga will be wealthy, resplendent and clever in speaking agreeably and in a humorous vein. He will have (in his body) marks of God Narayana (such as Sankha, Chakra, etc.). He will be always reciting in company with the virtuous the charming verses containing the name of that God. He feels very happy in showing reverence towards those that worship that God. He will be endowed with a good wife and sons. He will be loved by all and will be exceedingly amiable.
इन श्लोकों में तीन नये योग बताये हैं — (१) श्रीकंठ योग, (२) श्रीनाथ योग, (३) और वैरिञ्चि योग। श्रीनाथ विष्णु को कहते हैं, श्रीकंठ शिव को और विरिञ्चि ब्रह्मा को। इन्हीं तीनों के नाम से यह तीन योग लिखे गये हैं। (१) यदि लग्न का स्वामी, सूर्य और चन्द्रमा अपनी स्वराशि, मित्रराशि या उच्चराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हों तो श्रीकंठ योग होता है। (२) यदि बुध, शुक्र और भाग्यस्थान का स्वामी — ये तीनों उच्चराशि, स्वराशि या मित्रराशि में स्थित होकर, लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हों तो श्रीनाथ योग होता है। (३) यदि पञ्चम का स्वामी, बृहस्पति और शनि ये तीनों उच्चराशि, स्वराशि या मित्रराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हों तो विरिञ्चि योग होता है। (१) जो व्यक्ति श्रीकंठ योग में पैदा होता है वह रुद्राक्ष धारण करने वाला, विभूति लगाने से शरीर की धवल कान्ति वाला महात्मा, सर्वदा भगवान् शंकर का ध्यान करने वाला, धार्मिक और सदाचार के नियमों को अच्छी तरह पालन करने वाला, भगवान् शिव के सम्प्रदाय में दीक्षित होता है। ऐसा व्यक्ति साधु लोगों का उपकार करता है। और दूसरे धार्मिक सम्प्रदायों से न द्वेष करता है न ईर्ष्या करता है। ऐसा व्यक्ति सतत शिवाराधन से सुप्रसन्न और तेजस्वी होता है। टिप्पणी — यदि तीनों योगकारक ग्रह उच्च हों तो पूर्ण फल होगा। यदि स्वराशि के हों तो उससे न्यून फल और यदि मित्रराशि के हों तो उससे भी न्यून फल समझना चाहिये। चतुर्थ अध्याय में जो ग्रहों का बल निकालना बताया गया है उसके अनुसार सूर्य, चन्द्र और लग्नेश जितने अधिक बली होंगे उतना ही अधिक विशिष्ट फल होगा। (२) जो व्यक्ति श्रीनाथ योग में उत्पन्न होगा वह लक्ष्मीवान् (धनी), सरस वचन बोलने वाला (अर्थात् जिसके वचन, वाणी, लेख या उक्ति में सरसता हो), अपने वचनों से दूसरों को प्रसन्न करने में निपुण, भगवान् नारायण के चिह्नों से (शंख, चक्र आदि) से चिह्नित होता है। ऐसे व्यक्ति अन्य सज्जनों के साथ सर्वदा भगवान् नारायण सम्बन्धी हृद्य (हृदय को आनन्द देने वाले) स्तोत्रों या नामावली का संकीर्तन करते रहते हैं। जो लोग विष्णु-भक्त होते हैं उनका ये लोग बहुत प्रसन्न हृदय से आदर करते हैं। जो लोग श्रीनाथ योग में उत्पन्न होते हैं वे स्वयं बड़े सुन्दर होते हैं और उनके दर्शन कर अन्य लोगों के नेत्रों को भी बहुत आनन्द प्राप्त होता है। ऐसे व्यक्तियों को अच्छे पुत्रों का और स्त्री का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। (३) अब विरिञ्चि योग में उत्पन्न जातक का फल बताते हैं। जिसकी कुण्डली में विरिञ्चि योग हो वह बहुत बुद्धिमान हो, वैदिक धर्माचार्य हो, ब्रह्मज्ञान-परायण हो और गुणी हो। ऐसा व्यक्ति सर्वदा ही प्रसन्नचित्त रहेगा और वेदोक्त मार्ग से कभी विचलित नहीं होगा। उसके अनेक प्रख्यात शिष्य होंगे। सौम्य वचन वाला, बहुत धन, पुत्र, स्त्री आदि के सुख से युक्त। ऐसे व्यक्ति के मुखमण्डल पर सात्विक ब्रह्म तेज की उज्ज्वलता रहती है। ऐसे व्यक्ति दीर्घायु और जितेन्द्रिय होते हैं, और राजा लोग भी उन्हें नमस्कार करते हैं।
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