If Venus, Jupiter and Mercury occupy a Kendra, a Trikona or the second house, and Jupiter be also in his exaltation, his own or a friendly house and possess strength, the resulting Yoga is termed Saraswati.
इन श्लोकों में 'सरस्वती' योग तथा उसका फल बताते हैं। यदि बुध, बृहस्पति, शुक्र लग्न से केन्द्र (१, ४, ७, १०), कोण (५, ९) या द्वितीय स्थान में हों और बृहस्पति स्वराशि, मित्रराशि या उच्चराशि में बलवान हो तो 'सरस्वती' योग होता है। उदाहरणार्थ पूज्य स्वामी करपात्री जी महाराज की जन्मकुण्डली (जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में ११ अगस्त सन् १९०७ को) — इसमें बुध, बृहस्पति, शुक्र लग्न से केन्द्र में हैं और बृहस्पति उच्च राशि का बलवान् है। बृहस्पति परमोच्च अंशों पर है, उसे केन्द्र-बल प्राप्त है तथा पूर्ण द्विक-बल भी प्राप्त है। इस प्रकार बृहस्पति के पूर्ण बलवान् होने से, बहुत उत्तम रूप से सरस्वती योग घटित होता है। अब सरस्वती योग का फल बताते हैं। जिस व्यक्ति की जन्मकुण्डली में सरस्वती योग हो वह बहुत बुद्धिमान, नाटक, गद्य, पद्य (काव्य), अलंकार-शास्त्र तथा गणित-शास्त्र में महान् पटु और विद्वान् होता है। काव्यरचना, प्रबन्ध (सुन्दर लेख या सुन्दर पुस्तक लेखन) तथा शास्त्रार्थ में भी ऐसा व्यक्ति पारंगत (पूर्ण पंडित) होता है। तीनों लोकों में उसकी कीर्ति फैलती है। अति धनी होता है। स्त्री, पुत्र आदि के सुख से युक्त हो। ऐसे योग वाले व्यक्ति राजाओं द्वारा पूजा किये जाते हैं अर्थात् सम्मानित किये जाते हैं। और बहुत भाग्यवान् होते हैं।
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