The person at whose birth Saturn is in the 9th house will be bereft of fortune, wealth, children, father and religious merit. He will be wicked. If Saturn should occupy the 10th house, the person born will be a king or his minister, will devote himself to agriculture, will be brave, rich and renowned. The person who has Saturn in the 11th house in his nativity will have a long span of life, lasting wealth and good income, will be brave, free from disease and moneyed. Saturn in the 12th house makes the native impudent, indigent, without children, defective of some limb, stupid and driven out by his enemies.
यदि नवम में शनि हो तो भाग्य-हीन, धन-हीन, सन्तान-हीन, पितृ-हीन, धर्म-हीन होता है। नवम भाव से जिन बातों का विचार किया जाता है उन सबके सुख में कमी करता है; ऐसा व्यक्ति दुर्जन भी होता है। हमारे विचार से नवम धर्म-स्थान होने के कारण, यदि उच्चस्थ शनि नवम में हो तो धार्मिक विचारों में क्रान्ति लावेगा। बलवान् शनि यदि धर्म-स्थान पर बैठे और उस पर गुरु की शुभ दृष्टि हो तो मनुष्य धार्मिक तथा तपस्वी होता है। नवम तपस्या का स्थान है — यहाँ शनि वैराग्य उत्पन्न करता है। (१) आनन्दमयी 'माँ' उच्च कोटि की तपस्विनी हैं; उनके तुला का शनि नवम में है। (२) स्वामी करपात्री जी के मीन का शनि नवम में, तथा सूर्य, बृहस्पति, शुक्र, बुध कर्क राशि के लग्न में हैं। बलवान् बृहस्पति पूर्ण दृष्टि से नवम भाव में बैठे शनि को देखता है। (३) महाराजा साहिब डुङ्गरपुर की कुण्डली में भी कर्क-राशिस्थ बृहस्पति लग्न में बैठा है और नवमस्थ मीन राशि के शनि को देखता है। ये तीनों ही नवम-शनि वाले हैं, परन्तु शुभ राशि में स्थित होने से तथा शुभ ग्रह की दृष्टि होने से धार्मिक हैं — दो तो सन्यासावस्था में ही हैं। स्वामी करपात्री जी की कुण्डली में चार ग्रह एकत्रित होने से सन्यास-योग हुआ। शनि को सर्वदा खराब नहीं समझना चाहिए। अच्छे शनि तथा खराब शनि में वही अन्तर है जो कोयले और हीरे में — दोनों में कार्बन (तत्व विशेष) होता है, किन्तु कहाँ हीरा और कहाँ कोयला? रुद्र ने लिखा है कि रात्रि शेष में (जब रात समाप्त होने में चार घड़ी बाकी रहें) तब जिस जातक की जन्म-कुंडली में शनि निर्बल होता है वह जातक निद्रा-आलस्य में अपना समय बिताता है, किन्तु जिसकी कुंडली में शनि बलवान् होता है वह उस समय आध्यात्मिक चिन्तन, देवार्चन आदि में समय व्यतीत करता है। शनि 'स्पर्श' (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इनमें से वायु-प्रधान होने के कारण) का अधिष्ठाता है। बलवान् शनि दर्शनीय स्पर्श-सुखप्रद पट्ट-वस्त्र आदि दिलावेगा, किन्तु निर्बल शनि यदि वस्त्र दिलावेगा तो मोटा, खुरदरा कम्बल प्राप्ति करावेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई ग्रह अच्छा ही फल करेगा या निकृष्ट ही फल करेगा — यह किसी एक बात से निश्चय नहीं कर लेना चाहिये। २४ प्रकार के बल होते हैं; उन सब का तथा अष्टकवर्ग में शुभ रेखा, सर्वाष्टकवर्ग की रेखा, ग्रह आरोही है या अवरोही, उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि है या पाप ग्रहों की, किस भाव में है, भाव-मध्य से कितनी दूर है, किस नक्षत्र में है, उस नक्षत्र का स्वामी कौन-सा ग्रह है, वह ग्रह किन राशियों और किन भावों का स्वामी है, कहाँ बैठा है, उस पर किन ग्रहों की दृष्टि है — आदि अनेक बातों का तारतम्य कर बुद्धिमान् ज्योतिषी को ग्रह का प्रभाव निश्चित करना चाहिये। यदि दशम में शनि हो तो उत्कृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति राजा हो या राजा का मन्त्री हो, अत्यन्त धनी, प्रसिद्ध और शूर हो और कृषि-कार्य में तत्पर हो। पहले कृषि-कार्य सबसे उत्तम व्यवसाय माना जाता था, इसीलिये ऐसा लिखा है — आधुनिक समय में इसका अर्थ करना चाहिये कि उत्तम व्यवसाय करे। यदि ग्यारहवें घर में शनि हो तो आय-सहित, शूर, निरोगी (स्वस्थ), धनी, दीर्घायु और स्थिर सम्पत्ति वाला हो। बारहवें भाव में शनि हो तो अनिष्ट फल है — ऐसा व्यक्ति निर्लज्ज, धन-हीन, पुत्र से वंचित, विकलांग (शरीर के किसी भाग में विकलता) और मूर्ख होता है; उसके शत्रु उसे उत्सारित (दूर फेंकना) कर देते हैं। हमारा अनुभव है कि द्वादश में शनि दाँतों को भी खराब करता है और नेत्रों को भी हानि पहुँचाता है।
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