All Bhavas will produce completely their good results if they are occupied or aspected by benefics or their own lords, or planets owning benefic Bhavas and are free from association or aspect of malefics. The same will be the result in the case of malefics if they happen to be the owners of the Bhavas concerned. This good effect will be ensured in the case of all the planets when they are not occupying depression signs, when they are not eclipsed and when they are not posited in inimical signs.
भाव का शुभाशुभ विचार इस पन्द्रहवें अध्याय में बताया गया है। किसी भाव का विचार करना हो तो सर्वप्रथम निम्नलिखित सिद्धान्त लागू करने चाहिए। जिन भावों में शुभग्रह बैठे होते हैं, जो भाव शुभग्रह से दृष्ट होते हैं वे उत्तम फल देते हैं। जो भाव अपने स्वामी के सहित होता है वह शुभ फल देता है। यदि कोई भाव अपने स्वामी से दृष्ट हो तो भी शुभ फल देगा। यहाँ पूर्ण दृष्टि का पूर्ण फल, तीन चौथाई दृष्टि का तीन चौथाई फल, आधी दृष्टि का आधा फल और चौथाई दृष्टि का चौथाई फल समझना चाहिए। एक टीकाकार ने यह भी अर्थ किया है कि शुभ भवनों के स्वामी भी किसी भाव को देखें तो उस भाव की समृद्धि करेंगे किन्तु हमारे विचार से यहाँ “शुभ” शब्द का अर्थ नैसर्गिक शुभता है — भावाधिप होने के कारण शुभता नहीं। उदाहरण के लिए नवमेश, दशमेश शनि भावाधिप होने के कारण शुभ हुआ, किन्तु नैसर्गिक रूप से क्रूर है। तुला लग्न वाले को नैसर्गिक रूप से बृहस्पति शुभ हुआ, यद्यपि तृतीय और छठे का मालिक होने के कारण उसे शुभ नहीं कहेंगे। हमारे विचार से ग्रन्थकार का मत नैसर्गिक शुभ और पाप का भेद बताना है। यदि पापग्रह किसी भवन का स्वामी है और उस भवन में बैठा है तो उस भाव को बनायेगा, बिगाड़ेगा नहीं। इसी प्रकार पापग्रह यदि अपने भाव को (जिस राशि का वह स्वामी है) पूर्ण दृष्टि से देखे तो उस भाव की वृद्धि ही करेगा। किन्तु ऊपर की पंक्तियों में जो शुभ फल उत्पन्न करने का सिद्धान्त बताया गया है, वह तभी ठीक बैठता है, जब ग्रह नीच, अस्त या शत्रुक्षेत्री न हो। यदि इन तीनों दोषों में से एक, दो, या तीनों दोषों से युक्त हो तो शुभता प्रदान करने की शक्ति कम हो जाती है या नहीं रहती है।
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