Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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अन्वयः--अर्नि हुत्वा, देवतां पूजयित्वा, विप्रान् नत्वा, दिगीशं अचंयित्वा, ब्राह्मणेभ्यो दान दत्त्वा, चित्ते दिगीशं ध्यात्वा भूमिपालः अधिगच्छेत् ।। ८३ ॥ राजा को चाहिए कि अग्नि में हवन, इष्टदेवता की पूजा, ब्राह्मणों को नमस्कार, दिशा के स्वामी की पूजा करके और ब्राह्मणों को दान देकर चित्त में दिशा के स्वामी का ध्यान कर यात्रा करे ॥ ८३ ॥ है. क़माक का ना न नाए पक १३ ता सता सीकर ती मात आापतातररपीर # ननामार नक्षत्र-दोहद कुल्माषांस्तिलतण्ड्लानपि तथा साषांदच गव्यं दि | तद॒त्पायसमेव चाषपललं मार्ग च जश्ाशं तथा षाष्टिक्यं च॒प्रियडःग्वपृपमथवाचित्राण्डजान्सत्फलम् ॥ ८४ ॥
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