Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 11 · · Verse 80
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्वयः--ब्रतबन्धन देवतप्रतिष्ठाकरपीडोत्सवसूतकासमाप्तोी कदापि /अा--क-कक न कत ८ टक०. कक -जक अंक - न चलेत्‌, अकाल विद्युद्घनवर्षातुहिने अपि सप्तरात्र (यावत्‌ न चलेत्‌ ) ॥ ७६ ॥। यज्ञोपवीत, देवप्रतिष्ठा, विवाह, होलिकादि उत्सव और जननाशौच, मरणाशौच इन सबों की समाप्ति के बिना कदापि यात्रा न करे और ऐसे ही १९७ यात्राप्रकरण अकाल * में बिजली च॑मकने, मेघों के गर्जने, वर्षा होने और कुहरा पड़ने पर सात दिन तंक यात्रा न करे ॥ ७९॥। यात्रा-विशेष का विचार महीपतेरेकदिने पुरात्पुरे यदा भवेतां गमनप्रवेशकों । भवारशलप्रतिशुक्रयोगिनी विचारयेज्नवकदापि पर्डितः ॥ ८० ॥

Have a question about this verse?

Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.

Ask about this verse