Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 11 · · Verse 54
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्बयः--म॒गे गत्वा शिवे स्थित्वा अदितौ गच्छन्‌ रिपून्‌ जयेत्‌ । तथा मैत्रे प्रस्थाय शाक्रे स्थित्वा मूले ब्रजन्‌ हि रिपून्‌ जयेत्‌ ॥ जयार्थी अवनीश: हस्ते प्रस्थाय अनिलतक्षधिष्ण्ये स्थित्वा द्विंदेबे प्रवसेत च [तथा | वस्वन्त्यपुष्ये निजसीम्नि एकरात्रोषित: अवनीश: क्ष्मां लभते ॥ ५२-५३ ॥। जिस दिशा को यात्रा करना हों उसी दिशा को अपने घर से मृगशिरा नक्षत्र में चलकर आर्द्रा नक्षत्र में किसी के घर में टिककर पुनव॑सु नक्षत्र में वहाँ से भी यात्रा करे, और अनुराधा नक्षत्र में अपने घर से चलकर ज्येष्ठा नक्षत्र में कहीं टिककर मूल नक्षत्र में वहाँ से भी यीत्रा करे तो शत्रुओं को ३ यात्राप्रकरण जीते ॥ ५२ ॥ ऐसे ही हस्त नक्षत्र में अपने घर से चलकर १८९ चित्रा, स्वाती इन दो नक्षत्रों मेंकहीं टिककर विज्ञाखा नक्षत्र में वहाँ से भी यात्रा करे और धनिष्ठा, रेवती, पुष्य इन नक्षत्रों मेंअपने घर से चलकर गाँव की सीमा पर एक रात्रि टिककर वहाँ से यात्रा करे तो वह राजा शत्रु का राज्य जीत लेता है ।| ५३ ॥। समयबल उषःकालो विना पूर्वा गोधूलिः पदिचमां विना। विनोत्तरां निशीथः सन्‌ याने याम्थां विनाइभिजित्‌ ॥ ५४॥।

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