Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 11 · · Verse 51
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्वयः--दिगधीशे केन्‍्द्रे अवनीश: <गच्छेत्‌। तस्मिन्‌ [दिगधीशे] लालाटिनि (सति) अरिसेनां न इयात्‌ ॥ ५० ।। जिस दिशा को यात्रा करनी हो उस दिद्या का स्वामी यदि केन्द्र 'में स्थित हो तो राजा यात्रा करे और यदि दिशा का स्वामी लालाटिक योग- कारक हो तो राजा शत्रु की सेना पर चढ़ाई न करे ॥ ५०॥ ७ 7-्उ रस श्द्द अ्यब्य््न्न्न्ब्न्न्न्ण्ण्णा्ध्न्ब्नब््ण््नब्ल्ल्न्जन +:<६३०००४«३७७-०...७>-.०६०३६मीदआे...3 एज: «०«की. 4 3-५. 0.33... प्राच्यादां तरणिस्तनो भुगुसुतो लाभव्यये भूसुतः कर्म स्थो5थ तमो नवाष्टमगहे सौरिस्तथा सप्तसे । चन्द्र: शत्रुग हात्मजेषपि च बुध: पातालगों गीष्पतिवित्त ञ्रातृगहे विलग्नससदनाल्‍लालाटिकाः कौतिताः ॥ ५१॥

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