Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi
अन्वयः--दिग्द्वारभेलग्नगते सति यात्रा प्रशस्ता अथ॑दात्नी च पुनः जयकारिणी क् (स्थात्) तथा दिकप्रतिलोमलग्ने यात्रा हानि, विनाशं, च रिपुत: भय॑ कुर्यात् ॥ ४७॥ यात्राकाल में दिग्द्वार राशि लग्न में हो, अर्थात् सम्मुख या दाहिने हो तो यात्रा शुभ, धनादि की देनेवाली तथा विजय करानेवाली होती है, और यदि वही दिग्द्वार राशि पीछे या बायें हो तो यात्रा हानि, विनाश और शात्र से भय देनेवाली होती है ॥। ४७ ॥। शुभलग्न राहिः स्वजन्मसमये शुभसंयुतो यो यः स्वारिभान्निधनगो5पि च वेशिसंज्ञः । आता जे फैनइ कैली <# कक३४)“ि#.>तकक>क ००>-क +--+-अममप फानक--क ३ जा । विवाहप्रकरण लग्नोपगः स गसने जयदो5थ भूपयोगगंमो विजयदों सुनिशिः प्रंदिष्ट: ॥ ४८॥।
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