Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
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Hindi
जिस दिशा में जिस दिशा में उदित हो, अथवा गोलभ्रम* वश होकर दिशा में हो, इन तीन जाता हो, अथवा दिग्द्वार नक्षत्रों के क्रम से जिस जिस प्रकार से शुक्र सम्मुख कहा जाता है। परन्तु राजा को चाहिए कि दिशा में शुक्र उदित हो उस दिद्या की यात्रा न करे ।। ४० ।। वक्रनीचादिस्थित शुक्रदोष विद्विषाम् । बक्रास्तनीचोपगते भुगो: सुते राजा ब्रजन्याति वश हि ४१४ बुधोउनुकूलो यदि तंत्र संचलन् रिपूञ्जयेन्नेव जयः प्रतीन्दुजे ॥ वशंयाति । यदि बुध: अन्वयः--भृगो सुते वक़ास्तनीचोपगते ब्रजन राजा हि विद्विषां े )जय: नेव ॥| ४१॥
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