Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 11 · · Verse 34
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

िथ्य:, अन्वयः--तवभूम्य:, शिवव्लग्रः, अक्षविश्वे, अकेकृता: शक्ररसा:, तुरंगत ) स्यू:, एताः द्विदिशः च (तथा) अमावसव:ः इमा: तिथय: पूर्वतः (पूर्व॑दिशमारभ्य क्रमेण सम्मुखवामगाः न शस्ता: (भवन्ति) ॥। ३३ ।। नवमी, परीवा पूर्व में; एकादशी, तृतीया आग्नेय में; पञ्चमी, त्रयोदशी ी, दक्षिण में : द्वादशी, चौथि नैऋत्य में; चतुर्दशी, छठि पश्चिम में; संप्तम पूर्णमासी वायब्य में; द्वितीया, दशमी उत्तर में, अमावास्या, अष्टमी ईशान ाग दिशा में योगिनी-संज्ञक तिथियाँ हैं । यात्रा आदि में ये सम्मुख और वामभ में शुभ नहींहैं।। ३३ |). तिथियोगिनी चक्र आ० हि ० ८॥।॥ ३० पू०१॥। उ० २। १० तिथियोगिनी बार ७। १५ प० ६। ३॥। ११ १४ घातलग्न भूमि १ द्वय २ ब्ध्य ४ द्वि ७ दिक्‌ १० सुर्या १२ जरा ६ ष्ठा ८ ड्रो ९ शा ११ ग्नि ३ शायकाः ५ । व्जयेंत्सुधी: ।! ३४॥ यात्रायां मेघादिघातलग्नानि रे हि ह।का कक कल लता व 5. एनतरिस्रसर्ल न तो0प्ा-साातारन तनननमताप 2... 35 ७3७ 3*<3&6<5%+«<>> चंचल चल बकमपथपथ८+रम मच यात्रा प्रकरण ण नचिििांएऑऑ्ऑिऑणल्ल्न्ल्ल्छन्न्ननन्लन्ड्््ि श्द१ अन्वयः-भूमिद्वयब्ध्यद्विदिकसूर्या द्भराष्टांकेशाग्निशा यका: (क्रमात्‌) लग्नानि सुधी: यात्रायां वर्जयेत्‌ ॥ ३४ ॥।

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