लग्नशद्धि नो ककंनकझषकुम्भनवांशलग्ने नो5ब्जे तनौ रविशज्ञीज्यकुजे त्रिकोण । केन्द्रक्षंपट्त्रिभवगे च परेस्त्रिलाभषट्खस्थितनिधनशुद्धियुते बिलग्ने ॥ २ ॥। अन्वयः--ककेनक्रझमषकुम्भनवांशलग्ने (अग्निहोत्नविधि:) नो, अब्जे तनौ नो शुभ: । रविशशीज्यकुजे त्रिकोणे केंन्द्रक्षपट्त्रिभवगे परेः (बृधशुक्रशनेश्चरेः) लिलाभषट्खस्थिते: निधनशुद्धियुते विलग्ने [सति अग्निहोत्नविधि: शुभ: स्थात् | ॥ २॥। कर्क, मकर, मीन, कुम्भ लग्न में और इनके नवांशों में तथा लग्न में चन्द्रमा के (किसी के मत से शुक्र के भी ) रहते अग्न्याधानं नहीं करना चाहिए। पाँचवें, नयें, लग्न, चौथे, सातवें, दशवें और छठे स्थान में सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति और मंगल हों, तीसरे, गेरहवें, छठे और दशरवें स्थान में बुध, शुक्र, शनेशचर, राहु और केतु हों, जन्मलग्न से आठवीं को छोड़ अन्य लग्न में, अथवा जिससे आठवें स्थान में कोई ग्रह हो उस लग्न में अग्न्याधान शुभ होता है ॥ २॥
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