Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 9 · · Verse 1
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अग्न्याधानप्रकरण स्थादग्निहोत्रविधिरुत्तरगे.._ दिनेश भिश्रश्नवान्त्यशशिशक्रसुरेज्यधिष्ण्ये । रिक्तासु नोशशिकुजेज्यभगो न नीचे नास्तंगते न विजिते न च गनत्रगेहे ॥ १॥ अन्वयः--उत्तरगे दिनेश, मिश्रश्न॒वान्त्यशशिशक्रसुरेज्यधिष्ण्ये, अग्निहोत्नविधि: (शुभ: ) स्थात्‌। रिक्तासु नो, शशिकुजेज्यभगौ नीचे न, अस्तं गते न, विजिते न, च शत्रगहे स्थिते न (शस्त:) ।। १।। उत्तरायण सूर्य के रहते कृत्तिका, विशाखा, रोहिणी, तीनों उत्तरा, रेवती, मृगशिरा, ज्येष्ठा व पुष्य नक्षत्र में अग्न्याधान हो तो शुभ होता है। चौथि, नवमी, चतुर्दशी तिथि में, और चन्द्रमा, मंगल, ब्रहस्पति और शाुक़ अपने-अपने नीच स्थान में हों, अस्त हों, अन्य ग्रहों सेपराजित हुए हों, अथवा शत्रु के स्थान में हों तो अग्न्याधान नहीं करना चाहिए ॥ १॥

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