Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 8 · · Verse 1
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

द्विरागसनप्रकरण "४४०: चरेदथौजहायने घटालिमेषगे रवो रवीज्यशुद्धियोगतः शुभग्र॒हस्य वासरे । नुयुग्ममीनकन्यकातुलाबुषे विलग्नके द्विरागमं लघुश्रवे चरेडल्नरपे मूदूडुभिः ॥ १॥ अन्वयः--अथ (वधूप्रवेशानन्तरं) ओजहायने घटालिमेषगे रवोौ, रवीज्यशद्धियोगत: शुभग्र हस्यवासरे नृयुग्ममीनकन्यकातुलावृषे विलग्नके लघु श्नुवेचरे अख्पे मृदूडुभि: द द्विरागमं चरेत्‌ ॥ १ ॥। विवाह के दिन से पहिले, तीसरे, पाँचवें आदि विषम वर्षो में तथा कुम्भ, वश्चिक, मेष इन राशियों में से किसी में सूर्य केरहते; सूये और बृहस्पति के शुद्ध रहते; सोमवार, बुध, बृहस्पति या शुक्रवार में; मिथुन, मीन, कन्या, तुला वा वृष लग्न में तथा अद्विनी, पुष्य, हस्त, रोहिणी, तीनों उत्तरा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनवंसु, स्वाती, मूल, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा और रेवती नक्षत्र में स्त्री दूसरी बार अपने स्वामी के घर में जाय तो शुभ होता है ॥ १॥।

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