अस्वयः--ज्ष भ्ग्वो:द्वौ दो, इन्दौ पञ्च, रवो सार्धत्रयः, गुरौ रामः, मन्दागुकेत्वारे सार्ैकेकं विशोपका: (भवन्ति) ॥| &२ ।। इसी प्रकरण के सत्तासी श्लोक में कहे हुए अपने शुभ स्थानों में स्थित रहते बुध का दो बिस्वा, शुक्र का दो बिस्वा, चन्द्रमा का पाँच बिस्वा, सूर्य कासाढ़े तीन बिस्वा, बृहस्पति का तीन बिस्वा, शर्नश्चर का डेढ़ बिस्वा और राहु, केतु तथा मंगल का डेढ़-डेढ़ बिस््वा बल होता है। उक्त स्थानों से अन्यत्र स्थित रहते सूर्य आदि ग्रह शुन्यबल होते हैं। प्रयोजन यह है कि विवाहकाल में यह सब बल मिलकर पन््द्रह से बीस बिस््वा तक हो तो लग्न शुभ और दश से पन्द्रह बिस््वा तक हो तो मध्यम और पाँच से दस बिस््वा तक हो तो अशुभ होती है। पाँच बिस्वा से कम हो तो वह लग्न वजित होती है ॥| ९२ ॥। इवश्रवादि के सुख-दुःख जानने का उपाय दवश्र्: सितो5क: इवशुरस्तनुस्तनुर्जामित्रपः स्थाहयितो सनः शशी । एतद्बलं संप्रतिभाव्य तान्त्रिकस्तेषां सुख संप्रवदेद्विवाहितः ।! ९३॥ विवाहप्रकरण १४९ अन्वयः--सित: श्वश्रू; अकं: श्वशुर:, तनुः [लग्नं] तनुः [शरीरं] जामित्नपः दयितः, शशी मनः स्यात् । तान्त्रिक: एतदबलं संप्रतिभाव्य विवाहतः तेषां सुख संप्रवदेत् ।। 6३ ॥। शुक्र सासुसंज्ञक, सूर्य ससुरसंज्ञक, लग्न देहसंज्ञक, लग्न से सातवें स्थान का स्वामी पतिसंज्ञक और चन्द्रमा मनसंज्ञक होता है। विवाहकाल में इन ग्रहों केंबल का विचार करके ज्योतिषी को चाहिए कि कन्या के ससुर आदि के सुख दुःख को कहे । विवाहकाल में यदि शुक्र बली हो तो कन्या की सासु को पतोह की ओर से सुख, यदि सूर्य बली हो तो ससुर को सुख, यदि लग्न बलीं हो तो कन्या के शरीर को सुख, यदि लग्न से सातवें स्थान का स्वामी बली हो तो कन्या के पति को सुख और चन्द्रमा बली हो तो कन्या के मन को सुख देता है ॥| ९३ ॥।
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