। दिन का जितना मान हो उसमें पन्द्रह का भाग देने से जो दण्ड पल लब्ध हों वही एक मुहूर्त्त का मान होता है। पहिले मुहत्ते का स्वामी महादेव, दूसरे का सपं, तीसरे का मित्र नामक सूयें, चौथे के पितर, पाँचवें के वसु, छठे का जल, सातवें के विश्वेदेव, आठवें का अभिजित्, नवें का विधाता, का दशवें का इन्द्र, गेरहवें के इन्द्र और अग्नि, बारहवें का राक्षस, तेरहवें वरुण, चौदहवें का अर्यमा नामक सूर्य और पन््द्रहवें काभग नामक सूर्य स्वामी है । क्रम से ये पन्द्रह मुहूत्ते दिन में होते हैं ।। ५२ ॥। रात्रि के सुहत्त शिवो5जपादादष्टो स्युर्भेशा अदितिजीबकों । विष्ण्वकंत्वाष्ट्सरुतो सुहूर्त्ता निशि कीतिताः ॥ ५३ ७ ट्रमरुत: अन्वयः--शिव: अंजपादात् अष्टो. भेशा: अदितिजीवकौ विष्ण्वकेत्वाष् (एते) निशि [रात्रो] मुहूर्त्ता: स्यु: ॥ ५३ ॥। दिनमान को साठ में घटाने पर जो बाकी रहे वह रात्रिमान होता है । का उसमें पन््द्रह का भांग देने सेजो दण्ड-लब्ध हों वह रात्रि में एक मुह॒त्ते मुदहत्त से मात होता है। रात्रि में पहिले मुहूत्त के स्वामी शिव और दूसरे मी लेकर नवें मुहृत्त पर्यनत आठ मुहूत्तों के पूर्वभाद्रपद आदि आठ नक्षत्र स्वा े मुहूर्त्त के होते हैं, अर्थात् दूसरे मुहत्ते केस्वामी अज़पाद नामक शिव, तीसर मुह॒त्तें के अहिर्बुध्त्य नामक शिव, चौथे मुहूत्तें केपूषा नामक सूर्य, पाँचवें यम, सातवें मुहूत्तें के अग्नि, आठवें मुहत्तें के अद्विनीकुमार, छठे मूहत्ते के कुक पप् विवाहप्रकरण १२७ ब्रह्मा, नवें मुहूत्त के चन्द्रमा, दशवें मुहृत्त के अंदिति, गेरहवें मुह॒त्तं के बृहस्पति, बारहवें मुहृत्त के विष्णु, तेरहवें मुहत्त के सूयं, चौदहवें मुह॒त्तं के त्वष्टा अर्थात् विश्वकर्मा और पन्द्रहवें मुहूर्त्त का वायु स्वामी है। क्रम से ये पन्द्रह मुह्त्त रात्रि में होते हैं ॥॥ ५३ ॥
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