। रेवती, पुनवंसु; क्ृत्तिका और मघा में तीस दण्ड के बाद चार दण्ड विषघटी होता है । रोहिणी में चालीस दण्ड-के बाद, आइलेषा में बत्तीस दण्ड के बाद, अशिविनी में पचास दण्ड के बाद, उत्तराफाल्गुनी और शतभिष में अठारह दण्ड के बाद; :ूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, उत्तराषाढ़ और पुष्य में बीस दण्ड के बाद चार दण्ड विषनाड़ी .कही जाती हैं । विशाखा, स्वाती, मृगशिरा और ज्येष्ठा में चौदह दण्ड के बाद, आर्द्रा और हस्त में इक्कीस दण्ड के बाद, पूर्वभाद्रपद में सोलह दण्ड के बाद; उत्तराभाद्रपद, पूर्वाषाढ़ और भरणी में चौबीस दण्ड के बाद; अनुराधा धनिष्ठा और श्रवण में दश दण्ड के बाद चार दण्ड विषनाड़ी कही जाती हैं। मूल नक्षत्र में छंप्पन दण्ड के बाद चार दण्ड विषनाड़ी हैं। ये विषनाड़ियाँ शुभ कार्य में त्याज्य हैं । इनमें विवाहादि शुभ कार्य न करना चाहिए। परन्तु यहाँ विशेष यह है कि यदि उक्त नक्षत्रों का पूरे साठ दण्ड का मान हो तब तो उक्त दण्डों के बाद चार दण्ड विषेघटी होती हैं और यदि उक्त नक्षत्रों कामान साठ दण्ड से कम या ज्यादा हो तो उस नक्षत्र के मान को कहे हुए उसके अच्छू से गुणकर जितनी संख्या हो उसमें साठ का भाग देने से जो संख्या लब्ध हो उतने ही दण्ड के बाद चार दण्ड विंषघटी होती हैं ।उदाहरण--यथा रोहिणी नक्षत्र का सम्पूर्ण मान छप्पन दण्ड अठारह पल है । इनको उक्त रोहिणी के चालीस ज्रुवक से गुणा तो दो हजार दो सौ बावन हुएं। इनमें साठ का भाग दिया १२६ मुहत्तचिन्तामणि के बाद ीस पल क बत्तल तो सेंतीस दण्ड बत्तीस पल लब्ध हुए । इन्हीं सेंतीस ह | चार' दण्ड विषनाड़ी होगीं। ऐसे हीऔर भी जानना चाहिए ॥| ४९-५१॥
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