Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 6 · · Verse 4
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

अन्वमः--यदि बलिनो शशिभागंवोौ विषमभांशगतो तन्‌गहं प्रश्यतः (तदा) वरलाभं काकक +ल्‍का नाल >राहान+ लनकी क--+ कककसर कक ० ८ क आरा कककर काकर कप कप जय विवाहप्रकरण १०१ रचयतः । यदा इमौ [कंलिनों शशिभागंवौ |]यूगलभांशगतौ (तन्‌गहं पश्यतः) तदा यूवतिप्रदों (स्त:) ।। ३ ॥ प्रश्नकाल में यदि विषमराशि में या विषमराशि के नवांश में स्थित चन्द्रमा वा शुक्र बली होकर लग्न को देखते हों तो कन्या को वर का लाभ कराते हैं, और यदि समराशि में या समराशि के नवांश में स्थित शुक्र वा चन्द्रमा बली होकर लग्न को देखते हों तो वर को स्त्री का लाभ कराते हैं ।। हे ।। वधव्ययोग पष्ठाष्टस्थ: प्रइनलग्नाद्दीन्दुलेग्ने ऋ्रः सप्तमे वा कुजः स्यात्‌ । मूत्तविन्दुः सप्तमे तस्थ भौमो रण्डा सा स्थादष्टसंवत्सरेण । ४॥ अन्वय:--यदि इन्दु: प्रश्तलग्नात्‌ षष्ठाष्टस्थ: वा लग्ने क्ररः तस्य सप्तमे कुज:, वा मूतो इन्दु: तस्य सप्तमे भौम: तदा सा कन्या अष्टसंवत्सरेण रण्डा स्यथात्‌ ॥ ४ ।। प्रश्नकालिक लग्न से छठे वा आठवें स्थान में यदि चन्द्रमा स्थित हो तो विवाह से आठवें वर्ष में कन्या विधवा हो जाती है, और यदि प्रशइन कालिक लग्त में क्ररग्रह स्थित होंऔर उससे सातवें स्थान में मंगल हो तो भी विवाह से आठवें वर्ष में कन्या विधवा होती है, अथवा प्रइनकालिक लग्न में चन्द्रमा होऔर उसके सातवें स्थान में मंगल हो तो भी विवाह से आठवें वर्ष में कन्या विधवा होती है ॥ ४॥

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