Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi
अन्वयः--क्षी णन्दुपूर्ण चन्द्रेज्यज्ञभौमार्काकिभार्ग व: ग्रहै: त्रिकोणव्ययकेन्द्राष्टस्थिते: (क्रमंण) भिक्षाशी, यज्ञक्रत्ु, दीर्घजीवी, ज्ञानी, पित्तरुक, कुष्ठी च अन्नक्लेशवातव्या-धिमान्ू, भोगभागू, इति उक्त फल ज्ञेयम् ॥ १६-२० ॥। जिस लग्न में अन्नप्राशन इष्ट हो उससे नवें, पाँचवें, बारहवें, पहिले, चौथे, सातवें वा आठवें स्थान में यदि क्षीण चन्द्रमा स्थित हो तो वह बालक भीख माँग कर ज्वीविका करता है; पूर्णचन्द्रमा स्थित हो तो यज्ञ करता है; बृहस्पति स्थित हो तो दीर्घायु होता है; बुध स्थित हो तो ज्ञानी; मंगल स्थित हो तो पित्तरोगी; सूर्य स्थित हो तो कुष्ठरोगी; शनेशचर, राहु वा केतु स्थित हों तो अन्न का क्लेश और वातरोगी; और शुक्र स्थित हो तो वह बालक भोगी होता है ।। १९-२० ॥।
Have a question about this verse?
Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.