राध्यादिगाौ रविकुजों फलदों सितेज्यौं मध्ये सदा शशिसुतशच रसे5ब्जमन्दो । अध्वान्नवह्नि भयसन्मतिवस्त्रसोख्यदुःखानि सासि जनिभे रविवासरादो ॥ १९॥ इति मुह॒त्तचिन्तामणों गोचरप्रकरणं समाप्तम् ॥ ४७ अन्बयः--रविकुजौ राश्यादिंगो फलदो, सितेज्यौं मध्य फलदौ, शशिसुतः सदा फलद:, अब्जमन्दौ चरमे फलदो, (तथा) रविवासरादाौ जनिरभे (सति) मासि [तस्मिन् मासे ] (क्रमेण) अध्वान्व्रक्तनिभयसन्मतिवस्त्सोख्यदु:ःखानि भवन्ति ॥| १६ ॥। सूयें और मंगल राशि के पहले दशांश में फलदायक होते हैं । बृहस्पति और छुक्र राशि के मध्य दह्ांश में और बुध सदा अर्थात् जब तक राशि में रहे तब तक फलदायक होता है। चन्द्रमा और शनेश्चर राशि के अंतिम दशांश में फल देते हैं । अब चान्द्रमास में जिस कासर में जन्मनक्षत्र का प्रवेश होउस वासर का फल कहते हैं। शुक्लपक्ष की परीवा से लेकर अमावास्या तक जन्मनक्षत्र का प्रवेश यदि रविवार में हो तो रास्ता चलना पड़े, सोमवार में हो तो उत्तम अन्न मिले, मड्भल में हो तो अग्निभय, बुधवार में हो तो उत्तम मति, बृहस्पति में हो तो वस्त्रप्राप्ति, शुक्रवार में हो तो सौख्य और शनैश्चर में हो तो दुःख मिले ॥ १९॥।
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