Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 3 · · Verse 2
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

दिन-राज्नि के विभाग से संक्रान्तियों काशुभाशुभ फल त्यंशे दिनस्थ नृपतीन्प्रथमे निहन्ति मध्ये द्विजानपि विद्योप्परके चर शद्रास्‌ ॥| २ अस्ते निशाप्रहरकेष्‌ पिशाचकादीज्नक्तंचतरानपि नटानू. पशुपालकांदच । सुर्योदये सकललिड्रिजनं च सोम्य याम्यायनं सकरकक टयोनिरुक्तम्‌ | ३ ॥ अन्वयः--दिनस्य प्रथमे ल्यंशे (अकंसंक्रमणं ) नृपतीनू निहन्ति, मध्ये (त्यंशे) द्विजानू, अपरके (त्यंशे) विशः, अस्ते शूद्रान्‌ । निशाप्रहरकेषु (क्रमेण) पिशाचकादीन्‌, नकतंचरान्‌, नठान्‌ अपि, पशुषालकान्‌ च निहन्ति, सूर्योदय (अकंसंक्रान्ति:) सकललिज़िजन॑ निहन्ति । मकरककंटयो: (क्रमेण) सौम्ययाम्यायनम्‌ निरुक्‍्तम्‌ ।| २-३ ॥। दिनमान के तीन भाग करके यह विचार करना चाहिए कि प्रथमभाग में सूयेसंक्रान्ति हो तो क्षत्रियों का, दूसरे भाग में हो तो ब्राह्मणों का, तीसरे भाग में हो तो वेश्यों काऔर सूर्यारतकाल में हो तो शृद्रों कानाश करती है। रात्रि के पहले पहर में संक्रान्ति होतो पिशाचों और भूतों का, दूसरे पहर में हो तो राक्षसों का, तीसरे पहर में हो तो नटों का चौथे पहर में पशुपालकों अर्थात्‌ अहीरों का और सूर्योदय काल में पाखण्डियों का नाश करती है। मकर की संक्रान्ति को उत्तरायण और. कर्क की संक्रान्ति को दक्षिणायन कहते हैं ।। २-३ ॥।

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