There will be physical distress if Ketu be the lord of the 2nd or the 7th from the Ascendant. The remedial measures to obtain relief from the above effects are Mrityunjaya Japa and giving a goat in charity.
निष्कर्षं :- (i) स्वक्षेत्री, स्वोच्चगत, मूलत्रिकोणी, केन्द्रगत, त्रिकोणगत ग्रहों की दशान्तर्दशा सर्वत्र शुम होती है। इसी तरह दशेश से भी देखें । (ii) यदि नवांश में भी ग्रह इसी तरह हो तो विशेष शुम तथा राशि कुण्डली में हीन होता हुआ भी नवांश में शुम बली भाव राशिगत हो तो मध्यम शुम होता है । (iii) 2.7 मारक भावेशों की अन्तर्दशा सभी दशाओं में बलाबलानुसार कष्टप्रद या मृत्युप्रद होती है। (iv) पापयोग, पापदृष्ट होना, 6.8.12 भाव में रहना, अस्तंगत, नीचगत, शत्रुक्षेत्री होना, ग्रह की शुमता को घटाने वाले तत्व हैं। अधिक शुम तत्त्व होने पर आनुपातिक रूप से अधिक शुम तथा अधिक पाप तत्त्व रहने पर अधिक अनिष्ट फल होगा । माना पूर्वोक्त उदाहरण में विंशोत्तरी मतानुसार शनि दशा वर्तमान है। शनि सप्तमेश होने से मारक, अष्टमेश होने से भी शुभाशुम है, लेकिन त्रिकोणगत, योग कारक से युक्त, अपनी मूलत्रिकोण राशि से केन्द्रगत, शुम नवांशगत, गुरु से केन्द्र में, शुक्र से केन्द्र में है, अतः अधिकता शुम फल की रहेगी। यही वास्तविकता भी है। शुक्र लग्न से अशुम भावगत होने से भाव हानिकारक है, लेकिन दशेश से शुक्र केन्द्र में, वर्गोत्तम नवांश में, अति मित्रक्षेत्र में, गुरु से दृष्ट होने से भाव वृदिधकारक है। अतः सुख, लाम, वाहन व भवनादि (4.11 भावेश) का सुख अपनी अन्तर्दशा में अवश्य देता है, यही वास्तविकता भी है। (v) राहु केतु केन्द्र त्रिकोण में, केन्द्र व त्रिकोणेश के साथ ही बैठे हों, शुम योग कारक ग्रहों के साथ सम्बन्ध करें, 3.6.10.11 भावगत हों तो शुम होते हैं। उदाहरण में राहु शुम फलद है। (vi) धन स्थानेश की दशान्तर्दशा भी पूर्वोक्त नियमों के परिप्रेक्ष्य में शुम होती है। उदाहरण में धनेश सूर्य उच्च नवांशगत, केन्द्रगत, वेशि योग युक्त, शुमयुक्त, योग कारक सम्बन्धी शनि से पूर्ण दृष्ट, उत्तरायणगत है, ये शुम तत्त्व हैं। मारकेश होने से अशुम है। अतः मृत्यु न होकर दुर्घटनाप्रद, कष्टप्रद लेकिन धनप्रद होगा। यही वास्तविकता भी है। इस तरह विचारपूर्वक फल निश्चय करना चाहिए । फलित सूत्र :- (1) फलादेश में जहाँ राजा शब्द आया है, वहाँ उससे तात्पर्य यह है — बस्ती, गाँव, कालोनी, क्षेत्र का प्रतिष्ठित व्यक्ति, बड़ा धनी मानी व्यक्ति या यथावसर सचमुच का राजा। पुराने जमाने में राजे-रजवाड़ों के युग में जमींदार, दो-चार गाँव का लगान वसूलने वाला भी राजा ही कहलाता था। अब वह युग नहीं है। अतः समयानुरूप ही अर्थ समझें । (2) ग्रामाधिपत्य — गाँव का अधिपति, प्रधान पुरुष, सारे गाँव में मान्य, गाँव में पूजनीय, आदरणीय, अग्रगण्य होना, सब बातें गाँव के आधिपत्य में शामिल हैं । (3) प्रभु — समर्थ पुरुष, अपना अधिकारी, रोजगारदाता, राजा या क्षेत्राधिकारी । (4) विनाश — मृत्यु, नष्ट होना, लुप्त हो जाना, हाथ से निकल जाना। वि-णश् (अदर्शने धातु) से बना शब्द। अतः होते हुए भी सुख न मिलना । (5) राजद्वार — कोर्ट, कचहरी, थाना, सरकारी दफ्तर, सभी राजद्वार हैं । (6) चतुष्पाद — चौपाया, चार पैर वाला, चार परियों का वाहन, गाय, भैंस, कुत्ता आदि पालतू व कीमती जानवर, रेस का घोड़ा, ताँगे या सवारी का घोड़ा, रोजगार का साधन जानवर आदि । (7) ज्वरादि रोग — केवल बुखार नहीं। अपितु इलाज करवाने से ठीक होने योग्य, साध्य व सामान्यतः होने वाले रोग, जिनमें मृत्यु प्रायः नहीं होती है। ज्वर सामान्य रोग का वाचक है । (8) विषाहिभय — साक्षात् जहरीला जानवर डस ले। किसी भी शरीर में विष फैले, सेप्टिक, मवाद होना, गोली, काटे, कुत्ते आदि का जहर फैलना, अपूर्ण गर्भ नष्ट होने का जहर, भोज्य पदार्थ से उत्पन्न विष (फूड पोइज़निंग) आदि । (9) स्थानभ्रंश — स्थान, घर, जायदाद, ओफिस, दुकान आदि। पद, पदवी (Post) आदि में परिवर्तन, अवनति आदि। अथवा प्रतिष्ठा में कमी । (10) गजाश्वनरवाहन — सवारी का साधन। उत्तम, सम्मानजनक, कीमती, बड़ा वाहन। समयानुरूप अर्थ लें। नर वाहन पालकी है। आजकल ड्राइवर सहित गाड़ी मिल जाना भी नर वाहन है। हाथी से बड़े-वेशकीमती वाहन की प्राप्ति, अश्व से तीव्रगामी, आकार में लघु (Scooter) वाहन की प्राप्ति समझें । (11) ग्रामभूमिलाम — राजा-महाराजाओं के युग में जागीर इनाम में दी जाती थी। जागीरदार अब न होने से यथासम्भव गाँव या जन सामान्य के प्रदेश में, या जन्म भूमि में सचमुच सम्पत्ति मिलना, या सारे जनपद में प्रतिष्ठा पाना । (12) वस्त्राभरण — गहने कपड़े आदि। स्त्री के प्रसंग में शब्दार्थ। पुरुष प्रसंग में भौतिक सुख साधन सामग्री समझें । (13) सेनापतित्व — सेना अर्थात् जन-समूह। अनुशासित कार्यकर्ता का अधिकार। प्रबल जन समर्थन आदि। सबके हृदय पर राज्य करने का योग । (14) सेतुस्नान — रामेश्वरम् यात्रा को लाक्षणिक, सांकेतिक अर्थ समझें। दुर्गम, अतिदूरस्थ तीर्थस्थानों की यात्रा का आशय है । (15) प्रमेह रोग — मधुमेह, वीर्यरोग, धातुक्षय, स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, बहुमूत्र, शरीर में कमजोरी, धातु क्षीण होने से होने वाले सभी रोग। सामान्यतः स्वप्नदोष से लेकर हड्डी के कैंसर तक यथावसर बलाबलानुसार बुदिधपूर्वक समझें ।
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